काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान।तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान।।
तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुं ओर । बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।।
तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक।।
दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट ...
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनूरूप।।जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।सोइ सोइ भाव दिखावअइ आपनु होइ न सोइ ।।
तुलसीदास की मान्यता है कि निर्गुण ब्रह्म राम भक्त के प्रेम के कारण मनुष्य शरीर धारण कर लौकिक पुरुष के अनूरूप विभिन्न भावों का प्रदर्शन करते हैं। नाटक में एक नट अर्थात् अभिनेता अनेक पात्र...