चल मन! हरि चटसाल पढ़ाऊँ।। गुरु की साटी ग्यान का अच्छर, बिसरै तौ सहज समाधि लगाऊँ।।प्रेम की पाटी, सुरति की लेखनी,ररौ ममौ लिखि आँक लखाऊँ।।येहि बिधि मुक्त भये सनकादिक, ह्रदय बिचार प्रकास दिखाऊँ।।कागद कँवल मति मसि करि निर्मल,बिन रसना निसदिन गुन गाऊँ।।कहै रैदास राम भजु भाइ, संत राखि दे बहुरि न आऊँ।।
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अब कैसे छूटे राम रट लागी।प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पा...