अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee साहित्य | Collections

Author's Selected Works & Collections

कुल रचनाएँ: 15

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कौरव कौन, कौन पांडव

कौरव कौनकौन पांडव,टेढ़ा सवाल है।
दोनों ओर शकुनिका फैलाकूटजाल है।
धर्मराज ने छोड़ी नहींजुए की लत है। हर पंचायत मेंपांचालीअपमानित है।
बिना कृष्ण केआजमहाभारत होना है,कोई राजा बने,रंक को तो रोना है।
- अटल बिहारी वाजपेयी

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झुक नहीं सकते | कविता

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते। सत्य का संघर्ष सत्ता से,न्याय लड़ता निरंकुशता से,अंधेरे ने दी चुनौती है,किरण अंतिम अस्त होती है।
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप,वज्र टूटे या उठे भूकंप,यह बराबर का नहीं है युद्ध,हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध,हर तरह के शस्त्र से है सज्ज,और पशुबल हो उठा निर्लज्ज।
किन्...

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कवि आज सुना वह गान रे

कवि आज सुना वह गान रे,जिससे खुल जाएँ अलस पलक।नस-नस में जीवन झंकृत हो,हो अंग-अंग में जोश झलक।
ये - बंधन चिरबंधनटूटें - फूटें प्रासाद गगनचुम्बीहम मिलकर हर्ष मना डालें,हूकें उर की मिट जाएँ सभी।
यह भूख - भूख सत्यानाशीबुझ जाय उदर की जीवन में।हम वर्षों से रोते आएअब परिवर्तन हो जीवन में।
क्रंदन - क्र...

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रोते-रोते रात सो गई

झुकी न अलकेंझपी न पलकेंसुधियों की बारात खो गईदर्द पुरानामीत न जानाबातों ही में प्रातः हो गईघुमड़ी बदलीबूँद न निकलीबिछुड़न ऐसी व्यथा बो गईरोते-रोते रात सो गई
-अटल बिहारी वाजपेयी
 

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आओ फिर से दीया जलाएं | कविता

आओ फिर से दिया जलाएंभरी दूपहरी में अधियारासूरज परछाई से हाराअंतरतम का नेह निचोड़ेबुझी हुई बाती सुलगाएंआओ कि से दीया जलाएं।
हम पड़ाव को समझे मंजिललक्ष्य हुआ आँखों से ओझलवर्तमान के मोहजाल मेंआने वाला कल न भुलाएँआओ कि से दीया जलाएं।
आहुति बाकी यज्ञ अधूराअपनों के विघ्नों ने घेराअंतिम जय का वज्र बना...

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एक बरस बीत गया | कविता

एक बरस बीत गयाझुलसाता जेठ मासशरद चाँदनी उदाससिसकी भरते सावन काअंतर्घट रीत गयाएक बरस बीत गया
सींकचों में सिमटा जगकिंतु विकल प्राण विहगधरती से अंबर तकगूँज मुक्ति गीत गयाएक बरस बीत गया
पथ निहारते नयनगिनते दिन पल छिनलौट कभी आएगामन का जो मीत गयाएक बरस बीत गया
- अटल बिहारी वाजपेयी
 

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यक्ष प्रश्न - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता

जो कल थे,वे आज नहीं हैं।जो आज हैं,वे कल नहीं होंगे।होने, न होने का क्रम,इसी तरह चलता रहेगा,हम हैं, हम रहेंगे,यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।
सत्य क्या है?होना या न होना?या दोनों ही सत्य हैं?जो है, उसका होना सत्य है,जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।मुझे लगता है किहोना-न-होना एक ही सत्य केदो आयाम हैं,शे...

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पंद्रह अगस्त की पुकार

पंद्रह अगस्त का दिन कहता -आज़ादी अभी अधूरी है।सपने सच होने बाकी है, रावी की शपथ न पूरी है।।
जिनकी लाशों पर पग धर करआज़ादी भारत में आई।वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई।।
कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आँधी-पानी सहते हैं।उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं।।
हिंदू के नाते उनका...

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कैदी कविराय की कुंडलिया

गूंजी हिन्दी विश्व में स्वप्न हुआ साकार,राष्ट्रसंघ के मंच से हिन्दी का जैकार।हिन्दी का जैकार हिन्द हिन्दी में बोला,देख स्वभाषा-प्रेम विश्व अचरज में डोला।कह कैदी कविराय मेम की माया टूटी,भारतमाता धन्य स्नेह की सरिता फूटी।।
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बनने चली विश्वभाषा जो अपने घर में दासी,सिंहासन पर अंग्रेजी को लखकर दुनिय...

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गीत नहीं गाता हूँ | कविता

बेनकाब चेहरे हैं,दाग बड़े गहरे हैं,टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ ।गीत नही गाता हूँ ।
लगी कुछ ऐसी नज़र,बिखरा शीशे सा शहर,अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ । गीत नहीं गाता हूँ ।
पीठ मे छुरी सा चाँद,राहु गया रेखा फाँद,मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ ।गीत नहीं गाता हूँ ।
- अटल बिह...

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ऊँचाई | कविता

ऊँचे पहाड़ पर,पेड़ नहीं लगते,पौधे नहीं उगते,न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,मौत की तरह ठंडी होती है।खेलती, खिलखिलाती नदी,जिसका रूप धारण कर,अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,जिसका परसपानी को पत्थर कर दे,ऐसी ऊँचाईजिसका दरस हीन भाव भर दे,अभिनंदन की अधिकारी है...

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दूध में दरार पड़ गई | कविता

खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।बंट गये शहीद, गीत कट गए,कलेजे में कटार दड़ गई।दूध में दरार पड़ गई।
खेतों में बारूदी गंध,टूट गये नानक के छंद।सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।वसंत से बहार झड़ गई।दूध में दरार पड़ गई।
अपनी ही छाया से बैर,गले लगने लगे हैं ग़ैर,ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्...

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कदम मिलाकर चलना होगा | कविता

बाधाएं आती हैं आएंघिरें प्रलय की घोर घटाएं,पावों के नीचे अंगारे,सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,निज हाथों में हंसते-हंसते,आग लगाकर जलना होगा।कदम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफानों में,अगर असंख्यक बलिदानों में,उद्यानों में, वीरानों में,अपमानों में, सम्मानों में,उन्नत मस्तक, उभरा सीना,पीड़ाओं में...

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पहचान | कविता

पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमीऊंचा दिखाई देता है।जड़ में खड़ा आदमीनीचा दिखाई देता है।
आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है,न बड़ा होता है, न छोटा होता है।आदमी सिर्फ आदमी होता है।
पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य कोदुनिया क्यों नहीं जानती है?और अगर जानती है,तो मन से क्यों नहीं मानती
इससे फर्क नहीं पड़ताकि आदमी कहां...

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गूंजी हिन्दी

गूंजी हिन्दी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार;राष्ट्र संघ के मंच से, हिन्दी का जयकार;हिन्दी का जयकार, हिन्द हिन्दी में बोला;देख स्वभाषा-प्रेम, विश्व अचरज से डोला;कह कैदी कविराय, मेम की माया टूटी;भारत माता धन्य, स्नेह की सरिता फूटी!- अटल बिहारी वाजपेयी [कैदी कविराय की कुंडलियाँ]

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अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee का जीवन परिचय