अपनी साहित्यिक यात्रा में मुझे न किसी को पछाड़ने की फ़िक्र रही और न किसी से पिछड़ने का आतंक। इरादा सिर्फ इतना कि लिखते रहो, अपने कदमों से बढ़ते रहो, अपनी राह पर। जो देखा है, जाना है, जिया है, पाया है, खोया है, उसके पार निगाह रखो। एक व्यक्ति के निज के आगे और अलग भी एक और बड़ी दुनिया है। उसे मात्र...
दिन के बाद उसने चाँद-सितारे देखे हैं। अब तक वह कहाँ था? नीचे, नीचे, शायद बहुत नीचे...जहाँ की खाई इनसान के खून से भर गई थी। जहाँ उसके हाथ की सफाई बेशुमार गोलियों की बौछार कर रही थी। लेकिन, लेकिन वह नीचे न था। वह तो अपने नए वतन की आज़ादी के लिए लड़ रहा था। वतन के आगे कोई सवाल नहीं, अपना कोई खयाल नह...
गुमशुदा घोड़े पर सवारहमारी सरकारेंनागरिकों की तानाशाही सेलामबंदी क्यूं करती हैंऔर दौलतमंदों कीसलामबंदी क्यूं करती हैंसरकारें क्यूं भूल जाती हैंकि हमारा राष्ट्र एक लोकतंत्र हैऔर यहाँ का नागरिकगुलाम दास नहींवो लोकतांत्रिक राष्ट्रभारत महादेश कास्वाभिमानी नागरिक हैसियासत की यहतर्ज़ बदलिए।
- कृष्णा स...