काका हाथरसी | Kaka Hathrasi साहित्य | Collections

Author's Selected Works & Collections

कुल रचनाएँ: 17

Author Image

काका हाथरसी का हास्य काव्य

अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार
बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर जहाँ ‘मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
भ्रष्टाचार
राशन की दुकान पर, देख...

पूरा पढ़ें...

वंदन कर भारत माता का | काका हाथरसी की हास्य कविता

वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय ।काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय ॥
मैं अपनी त्याग-तपस्या से जनगण को मार्ग दिखाता हूँ ।है कमी अन्न की इसीलिए चमचम-रसगुल्ले खाता हूँ ॥
गीता से ज्ञान मिला मुझको, मँज गया आत्मा का दर्पण ।निर्लिप्त और निष्कामी हूँ, सब कर्म किए प्रभु के...

पूरा पढ़ें...

हास्य दोहे | काका हाथरसी

अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज
#
अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट
#
अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख,ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख
#
अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद,देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंद
...

पूरा पढ़ें...

स्वतंत्रता का नमूना

बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीरजहाँ ‘मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीरखींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कूपकड़ें टी.टी., गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कूगुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूनाप्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना

पूरा पढ़ें...

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा

सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमाराहम भेड़-बकरी इसके यह ग्वारिया हमारा
सत्ता की खुमारी में, आज़ादी सो रही हैहड़ताल क्यों है इसकी पड़ताल हो रही हैलेकर के कर्ज़ खाओ यह फर्ज़ है तुम्हारासारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
चोरों व घूसखोरों पर नोट बरसते हैंईमान के मुसाफिर राशन को तरशते हैंवोटर से वोट ...

पूरा पढ़ें...

जय बोलो बेईमान की | हास्य-कविता

मन मैला तन ऊजरा भाषण लच्छेदारऊपर सत्याचार है भीतर भ्रष्टाचारझूठों के घर पंडित बाँचें कथा सत्य भगवान कीजय बोलो बेईमान की!
लोकतंत्र के पेड़ पर कौआ करे किलोलटेप-रिकार्डर में भरे चमगादड़ के बोलनित्य नयी योजना बनती जन-जन के कल्यान कीजय बोलो बेईमान की!
महँगाई ने कर दिए राशन-कारड फेलपंख लगाकर उड़ गए च...

पूरा पढ़ें...

काका हाथरसी की दो हास्य कविताएं

चोटी के कवि बोले माइक पकड़ कर, पापड़चंद ‘पराग’।चोटी के कवि ले रहे, सम्मेलन में भाग॥सम्मेलन में भाग, महाकवि गामा आए।काका, चाचा, मामाश्री, पाजामा आए॥हमने कहा, व्यर्थ जनता को क्यों बहकाते?दाढ़ी वालों को भी, चोटी का बतलाते॥
 दाढ़ी का सम्मान ईर्ष्या करने लग गए, क्लीन शेव्ड ...

पूरा पढ़ें...

हिन्दी-भक्त

सुनो एक कविगोष्ठी का, अद्भुत सम्वाद । कलाकार द्वय भिडे गए, चलने लगा विवाद ।। चलने लगी विवाद, एक थे कविवर 'घायल' । दूजे श्री 'तलवार', नई कविता के कायल ।।कह 'काका' कवि, पर्त काव्य के खोल रहे थे। कविता और अकविता को, वे तोल रहे थे ।।
शुरू हुई जब वार्ता, बोले हिन्दी शुद्ध । साहित्यिक विद्वान् थे, परम...

पूरा पढ़ें...

हिंदी की दुर्दशा | हिंदी की दुर्दशा | कुंडलियाँ

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य।सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य।।है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा।।कहँ ‘काका', जो ऐश कर रहे रजधानी में।नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में।।
-काका हाथरसी
#
पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस।हिंदी पढ...

पूरा पढ़ें...

हिंदी-प्रेम

हिंदी-हिंदू-हिंद का, जिनकी रग में रक्तसत्ता पाकर हो गए, अँगरेज़ी के भक्तअँगरेज़ी के भक्त, कहाँ तक करें बड़ाई मुँह पर हिंदी-प्रेम, ह्रदय में अँगरेज़ी छाईशुभ चिंतक श्रीमान, राष्ट्रभाषा के सच्चे‘कानवेण्ट' में दाख़िल करा दिए हैं बच्चे
- काका हाथरसी
 

पूरा पढ़ें...

काका हाथरसी की कुंडलियाँ

पत्रकार दादा बने, देखो उनके ठाठ।कागज़ का कोटा झपट, करें एक के आठ।।करें एक के आठ, चल रही आपाधापी । दस हज़ार बताएं, छपें ढाई सौ कापी ।।विज्ञापन दे दो तो, जय-जयकार कराएं।मना करो तो उल्टी-सीधी न्यूज़ छपाएं ।।
2)
कभी मस्तिष्क में उठते प्रश्न विचित्र।पानदान में पान है, इत्रदान में इत्र।।इत्रदान में इ...

पूरा पढ़ें...

महंगाई

जन-गण मन के देवता, अब तो आंखें खोल महंगाई से हो गया, जीवन डांवाडोल जीवन डाँवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू कहं 'काका' कवि, दूध-दही को तरसे बच्चे आठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे
राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर 'क्यू' में धक्का मारकर, पहुंच गये बलवीर पहुँच गये बलवीर...

पूरा पढ़ें...

राष्ट्रीय एकता

कितना भी हल्ला करे, उग्रवाद उदंड, खंड-खंड होगा नहीं, मेरा देश अखंड। मेरा देश अखंड, भारती भाई-भाई, हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-पारसी या ईसाई। दो-दो आँखें मिलीं प्रकृति माता से सबको,तीन आँख वाला कोई दिखलादो हमको।
अल्ला-ईश्वर-गॉड या खुदा सभी हैं एक,अलग-अलग क्यों मानते, खोकर बुद्धि-विवेक। खोकर बुद्धि विवेक,...

पूरा पढ़ें...

कार-चमत्कार | कुंडलियाँ

[इसमें 64 कार हैं, सरकार]
अहंकार जी ने कहा लेकर एक डकार, कितने कार प्रकार हैं, इस पर करें विचार। इस पर करें विचार, कार को नमस्कार है,ओंकार में निर्विकार में व्याप्त कार है। निरंकार या निराकार का चक्कर छोड़ो, कलियुग में साकार ब्रह्म से नाता जोड़ो।
मजिस्ट्रेट के कोर्ट में, होन...

पूरा पढ़ें...

स्त्रीलिंग पुल्लिंग 

काका से कहने लगे ठाकुर ठर्रा सिंहदाढ़ी स्त्रीलिंग है, ब्लाउज़ है पुल्लिंगब्लाउज़ है पुल्लिंग, भयंकर गलती की हैमर्दों के सिर पर टोपी पगड़ी रख दी हैकह काका कवि पुरूष वर्ग की किस्मत खोटीमिसरानी का जूड़ा, मिसरा जी की चोटी।
दुल्हिन का सिन्दूर से शोभित हुआ ललाटदूल्हा जी के तिलक को रोली हुई अलॉटरोली हु...

पूरा पढ़ें...

कुर्सी पर काका की कुंडलियाँ

कुरसीमाई
शासन की कुरसी मिले, हों साहब के ठाठ, कुरसी जी की कृपा से, सोफा हाजिर आठ। सोफा हाजिर आठ, मारते रहें मलाई, राजनीति में सर्वश्रेष्ठ है कुरसीमाई। जिसे प्राप्त हो, चेहरे पर खिल जाए बसंता, हो जाता है पाँच साल तक का चिपकंता।
कुरसीरानी
कुरसीरानी से रहे, नेताश्री को मोह, करते प्रभु से प्रार्थन...

पूरा पढ़ें...

श्रोताओं की फब्तियां

कवियों की पंक्तियां, श्रोताओं की फब्तियां :
० कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे...... (नीरज) ( तो हम क्या करें, टाइम पर क्यों नहीं आए आप ? )
० जी हां हज़ूर ! मैं गीत बेचता हूं...... (भ० प्र० मिश्र) ( बेचिए जरूर, लेकिन बिक्रीकर का लाइसेंस ले लीजिए हजूर !)
० जाओ, पर संध्या के संग लौट आना तुम........

पूरा पढ़ें...

काका हाथरसी | Kaka Hathrasi का जीवन परिचय