मानुस हौं तो वही रसखान बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥ या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि,...
मिली खेलत फाग बढयो अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै।कर कुंकुम लै करि कंजमुखि प्रिय के दृग लावन को धमकैं।।रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै।मनौ सावन सांझ ललाई के मांझ चहुं दिस तें चपला चमकै।।
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खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता मुख की उपमा किहीं दीजै।देखत ही बनि आवै भलै रसखन कहा है ज...