था मैं भी पेड़,अब हूँ धरा में पड़ा सा, अब धूल हो जाऊंगा,धूल मे पड़ा-पड़ा,सहा था सूरज की तपन,अब हल्की चिंगारी राख़ सा कर जाएगी, ख़ाक ने जना था मुझे,अब ख़ाक ख़ाक सा कर जाएगी।
- अमर मंडलamarmandal250@gmail.com