डब्बू ने इक सपना देखा
चाँद सैर पर जाने का।
उड़ता हुआ चाँद पर पहुँचा
बड़ा मज़ा उड़ जाने का।

लेकिन जब वो चाँद पे पहुँचा
वहाँ पड़ा पूरा सुनसान।
न घर थे न बाग़ बगीचे
मौसम भी खुद से अनजान

बड़े बड़े मिट्टी के टीले
उबड़ खाबड़ रस्ते थे
न पंछी न कोई जानवर
न पढ़ाई के बस्ते थे।

हवा वहाँ नहीं चलती थी
न बादल न रँग थे।
न नदियाँ न झरने सुंदर
न ही मित्र कोई सँग थे।

न मम्मी न पापा दिखते
न भोजन न पानी
डब्बू बाबा लगे सिसकने
याद आ गई नानी।

फिर धीरे से मम्मी ने
डब्बू को पुचकारा।
सपना टूटा आँख खुली
मम्मी से लिपटा बेचारा।

एक ह्रदय का टुकड़ा होता
दूजा जीवन की पहचान।

-डॉ सुशील शर्मा, भारत
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