[ न्यूज़ीलैंड की लोक कथा ]

बहुत पहले की बात है। उस समय लोगों को आग जलाना नहीं आता था। यह माउइ था जिसने मनुष्य जाति को आग जलाने का उपाय बताया था।

माउइ ने निश्चय किया कि वह धरती के भीतर जाकर आग का पता लगाएगा। पृथ्वी में एक सूराख करके वह भीतर घुसा और अग्नि की माँ माफुइक से मिला। उसने उससे एक चिनगारी मांगी। अग्नि की माँ ने अपनी अंगुलियों के जलते नख में से एक नख उसे दे दिया।

माउइ उस नख को लेकर जब कुछ दूर चला गया तो उसने सोचा, यह तो आग है। उसने आग उत्पन्न करने की विधि तो बताई ही नहीं। यह सोचते ही उसने आग को नदी में फेंक दिया। वह लौटकर फिर अग्नि की माँ के पास गया और चिनगारी ली। इस प्रकार वह नौ बार आग लाया और नदी में फेंकता गया। दसवीं बार जब वह गया तो अग्नि की माँ बहुत ही क्रोधित हुईं। उसने अपनी अंगुली का दसवां नख उस पर फेंका।

जंगल के वृक्ष, घास इत्यादि जलने लगे। जब आग बहुत भयंकर हो गई तो माउइ ने वर्षा के लिए प्रार्थना की। शीघ्र ही वर्षा होने लगी जिससे आग बुझ गई। अग्नि को बुझते देखकर उसकी माँ ने कुछ चिनगारियों को वृक्षों में छिपा दिया। तभी से वृक्षों में आग छिपी हुई है। और इस प्रकार बाद में मनुष्य जान गया है कि किस प्रकार दो लकड़ियों को आपस में रगड़ने से आग उत्पन्न हो जाती है।

भावानुवाद : रोहित कुमार 'हैप्पी'
न्यूज़ीलैंड