हे कविता!
हर रात सोते समय,
एक कविता को 
सपने में आने के लिये प्रार्थना करती हूँ। 

वह आती है
कुछ अनसुलझी पहेली की तरह,
सपने में भी स्वप्न जैसी
आनंद विभोर खिले हुए फूल जैसी। 

हे कविता! 
जब तुम कागज पर उतरती हो,
तो मेरे सपने भी जिंदा हो जाते हैं
हँसते-गातेऔर नाचते हैं। 

आज भी इंतजार है, हे कविता!
तरसती हूँ मैं तुम्हारे लिए,
मै देखती हूँ तन से, मन से
उठकर,
कभी अकेली। 

रात भी उमड़ती है, भोर के उजियाले के लिए
हे कविता!
इंतजार करती हूँ,
सपने में। 

-मनीषा खटाटे