ममता में सुकुमार हृदय को कस डाला था,
कुछ को सभी बना स्नेह उनसे पाला था,
यहाँ अकेले सभी - आज यह जान गया।
मैं परदेशी अपना पथ पहिचान गया॥

बहा, यहाँ से वहाँ, वासना के प्रवाह में,
था विवेक से हीन फूल ही दिखे राह में,
अब पथ के शूलों पर मेरा ध्यान गया।
मैं परदेशी अपना पथ पहिचान गया॥

मैं राही था, चलने में बस मुझे शान्ति थी,
यहाँ बसेरा किया हाय ! सब ओर भ्रान्ति थी;
मैं अपनी पिछली भूलों को मान गया।
मैं परदेशी अपना पथ पहिचान गया॥

यहाँ रहा मैं सदा विवश, भूला, भरमाया,
लो ! सहसा चल पड़ा छोड़ सब ममता-माया,
इस पथ से फिर आने का अरमान गया।
मैं परदेशी अपना पथ पहिचान गया॥

-चंद्रप्रकाश वर्मा 'चंद्र'