बाबा, भर दे मेरा प्याला !
परदेसी हूँ दुख का मारा, फिरता हू मैं मारा-मारा,
जग में कोई नहीं सहारा, खोल गिरह का ताला !

जोगी हूँ मैं दान का प्यासा, निर्बुद्धी हूँ ज्ञान का प्यासा,
चंचल मन है ध्यान का प्यासा, कर दे अब मतवाला !

तेरे कारण जोग लिया है; ऐश छोड़ कर सोग लिया है,
एक निराला रोग लिया है, पड़ा जिगर में छाला !
बाबा, भरदे मेरा प्याला !

-पंडित इंद्रजीत शर्मा