गायों के रंभाने की आवाज आने लगी। दूर  से धूल की उड़ती गुबार ने गोधूली बेला का शंखनाद कर ही दिया। गायों के गले में बंधे लकड़ी के डिब्बे में लगी घंटी मानो उनके कदमों से जुगलबंदी कर रही हो। 

‘‘कृष्णा’’ ने गायों को भीतर कोठार में बांधा और चल पड़ी टपरे की ओर...। चारों ओर लकड़ियाँ बिखरी थी। गट्ठा, चिनार, जलाऊ, बत्ता, चिल्फा, बूरा, चूरा, और न जाने क्या-क्या। जिनके यहाँ चिरान (लकड़ी काटने की) की सुविधा थी वे गट्ठड़ (गोले) ले लेते थे। चिरी (चीरा लगाया गया लकड़ी)। एक खास वर्ग की जरूरत होती थी। पतली पट्टियों को ‘फारे’ की शक्ल में कोई ले जाना चाह रहा था। कोई लकड़ियों के बारिक-बारिक टुकड़े (चिल्फा) को तौलाने आतुर था। कृष्णा को तो पेंसिल छीलने पर निकले छिलके सी पतली लकड़ियों का छिलका चाहिये था। खुले आँगन में लकड़़ी के चौकोन पलड़े पर बने तराजू में ‘‘लकड़ी बेचईया’’ बड़ा सा बॉट (वजन) रखता और जमीन पर लकड़ियों की विविध किस्मों को पटकता जाता। 

‘‘कृष्णा’’ काजर सी अंजी आँखें, श्यामवर्ण, कालिया सर्प से केश पर मन एकदम उजला।  शाम को चूल्हा जलना है तो लकड़ियों का इंतजाम तो करना ही पड़ेगा।

कृष्णा का मन तो मन तो जाने कहाँ-कहाँ विचरता था। कभी नदी के पार में महादेव घाट पर वृक्ष में टंगी लाल पोटली को ध्यान से देखा करती। षोडशी कृष्णा को जीवन-मरण की समझ नहीं थीं। वह मन ही मन सोचा करती थी। इस विराने में इन पोटलियों को  कोई क्यों नही चुराता? उसे तो बाद में समझ में आया कि कीमत तो जीवित हाड़ माँस की होती है,  तन के तंबूरे से निकली इन अस्थियों को सिर्फ और सिर्फ वृक्ष ही यथेष्ट सम्मान दे सकते हैं। आम के पेड़ की शादी भी उसने देखी थी। अम्मा कहती थी कि आम का फल उसकी शादी के बाद ही खाना चाहिये।

सब जीवित गुण होने के बाद भी इन वृक्षों को जब काटा जाता होगा तो कितनी पीड़ा होती होगी। वह गायों के रंभाने की आवाज सुन दौड़ पड़ती अपने घर। बूरा सिगड़ी में भर ‘‘चित्तौड़गढ़ के किले’’ जैसे जब वह सिगड़ी के नीचे से ऐंठे हुए कागज से आग जलाती तो उसके बाद सिगड़ी की आग, डेगची की भात, छप्पर से निकलती धुएं की लकीरों की जुगलबंदी देखने लायक होती थी। भात की खुशबु से पड़ोस भी गमक जाया करते थे। 

आज सुबह से मोहल्ले में चहल-पहल थी। ‘नुआ बायले’ (नई बहु) गाँव आई थी। मंदिर के पास के बरगद जो पूरे गाँव के बाबा स्वरूप थे। उन्हीं की छाँव में नुआ बायले को बिठाया गया। बरगद की सैकड़ों जड़ों ने आज हाथ बनकर आशीष न्यौछावर करने की ठान ली थी। बरगद की पहले पूजा हुई। फिर बाजे गाजे के साथ दुल्हन का गृह प्रवेश। पीपल भी भला कब पीछे रहने वाला था। वह भी साथ हो लिया। सांझ हुई नही कि संध्या दीपक बारने कोई आये इसका इंतजार तो पीपल को भी रहता था। 

कृष्णा को गाँव के पास के जंगल जाकर गिरी सूखी टहनियाँ बटोरने में ही मन रूचता था। सूखे पत्तों को बुहार कर गट्ठे में बांधना और लाना उसकी और उसकी सखियों का रोज का काम था। उसे यही भला जान पड़ता था। भला कोई जीवित (वृक्ष) हाड़ मांस (शाखों, टहनियों) की चिता जलाता है? ये वृक्ष तो बिना मांगे ही सैकड़ों पत्ते खुशी-खुशी उलीच देते थे।

कृष्णा जंगल के आगे भीतर तक जाती जहाँ मधूक (महुआ) के वृक्ष उसके आने के खुशी में गमका करते थे। ‘‘गांव अब शहरिया होने को मचल रहे थे,’’ साथ ही संदिग्ध लोगों की उपस्थिति भी उस गांटँव में बढ़ती जा रही थी। बारिश में फुहारों के साथ पत्तों की ता-ता-थैय्या तो, पुरवाई चलने पर पत्तों की और हवा की शहनाई गूँजती थी जंगलो में । इन सबसे कृष्णा का पोर-पोर परिचित था। कौन सा वृक्ष उदास है, किस वृक्ष की अनबन किसके साथ हुई है? किस वृक्ष ने नौनिहाल वल्लरियों को पनाह देने से मना किया है। यह सब हिसाब-किताब कृष्णा को मुँह जुबानी याद था। 

कृष्णा जब साँझ ढले टोकरियों में सूखे पत्ते लेकर घर आती तो ‘‘पूरा शरीर ही जंगल-जगल लगता।’’ वृक्षों की खुशबु से सुवासित वह ‘‘वृक्षगंधा’’ ही ज्यादा लगती कृष्णा कम। आज जब कृष्णा जंगल गई तो  वृक्षों की संख्या उसे कम लगी। वह बूढ़ा सेमल, वह जवान मधूक, वह नन्हा सागौन... इनकी संख्या में लगातार कमी...। आज तो कृष्ण हतप्रभ थी । कदमों के पदचाप जो संख्या में ज्यादा थे। उनकी आवाज लगातार बढ़ती जा रही थी। कृष्णा का मन आशंका से धड़क उठा साथ ही गाड़ियों की अस्पष्ट आवाज आ रही थी। 

कृष्णा मन ही मन सोचती थी कि ‘‘मानव शरीर तो वृक्ष के जैसा ही होता है। जमीन से संस्कारों को सोख नस-नस में प्रवाहित विकास-रुधिर से आरक्त होता है। लड़कियाँ भी वृक्ष जैसी होती हैं। नये जगह में लगाये जाने पर कुछ क्षण तो उदास रहती हैं पर जब वसुधा अपनी छाती पर पनाह देती है तो खुशी से पल्लवित होकर आस-पास को सुवासित कर जाती है।’’

साँझ घिर आई थी। कृष्णा को जल्द ही घर पहुंचना था। वह अनमने ढंग से पलटी और आधे रास्ते में ही थी कि कुछ लपट सी उठती दिखी। कृष्णा दौड़ी वापस जंगल की ओर। अरे... यह क्या दावानल, लपटें उठती जा रही थी। कृष्णा बदहवास। अभी तो यहां छोटी सी चिंगारी भी नहीं थी। अचानक अपरिचितों के बीच कृष्णा ने खुद को घिरा पाया। अरे ये तुम लोगों ने आग लगाई। ठहरो अभी सबको बुला लाती हूँ। पर कृष्णा के इस उद्घोष के बाद विभित्स हँसी के घेरे ने कृष्णा को घेर लिया। कृष्णा कभी इस वृक्ष को सहलाती कभी उसको। कभी सुलगते वृक्षों को देख रो पड़ती। यह क्या एक हो तो कुछ कर पाये यहाँ तो दावानल फैल चुका था। मानो वृक्षों ने आज साथ जियेंगे साथ मरेंगे वाली कसम बड़ी बेबसी, अवसादित होकर खा ली थी। वृक्षों के पत्ते टहनियों के साथ झुलसकर मँस के लोथड़ों से गिरने लगे थे। पूरे जंगल में वृक्षों के जलने की बास थी। सुबह पूरे जंगल खाक हो चुका है। मानुष गंध भी उस जंगल में घुली थी। मानुष गंध कहाँ वहाँ तो वृक्ष गंधा ही थी। जिसने अपने आपको स्वाहा किया वृक्षों के साथ।

‘‘जंगल-जंगल काया में वृक्ष की बास, वृक्षों की असंख्य रोम छिद्रों सी कृष्णा की त्वचा, छाल उतारने पर निकला रिसाव बस कृष्णा की आँखों से बह रहा था। ’’ इन जंगलों के वृक्षों में ही उसका अस्तित्व था। कई दिन बीत गये। लोग कहते हैं कि इस जंगल में एक पेड़ हैं। जिससे मानुष गंध आती है। उसका नाम है--‘वृक्षगंधा।‘

वह आज भी इस जंगल में नई कोपलों का इंतजार करती हैं। जंगल की अकेली रखवाली करती है। मृत कृष्णा का अस्तित्व इन जंगले के वृक्षों में ही था। वह वृक्षगंधा बन चुकी थी। चुपचाप निःशब्द।

-रजनी शर्मा बस्तरिया
 रायपुर (छ.ग.)
 ई-मेल: rajnibastariya.153@gmail.com