आग कितनी है बता अंगार में
जान आयेगी तभी दो चार में

नेक नामी के सिवा कुछ भी नहीं
सोच लो फिर क्या बचा संसार में

तुम खड़े ही रह गए पैसे लिए
बिक गई सरकार जिस बाजार में

यह सियासत है बुरा लग जायेगा
बात मत छेड़ो यहाँ बेकार में

अन्त में उनकी भी जय होती ही है
जो लगे रहते हैं जय जयकार में

क्या परिन्दा था उड़ा तो उड़ गया
रंग का कच्चा था आखिरकार में

ज़िन्दगी को प्राण समझा फिर जिया
जी रहा हर दिन इसी विस्तार में

-गिरेन्द्रसिंह भदौरिया 'प्राण'
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