दो भाई थे। उनके नाम नहीं बताऊँगा। मेरे स्कूल के दिनों के साथी थे। दोनों से ही अच्छा मेल-जोल था। परंतु कई वर्ष तक मेल-मुलाक़ात न हो सकी और संपर्क टूट गया। कुछ महीने पहले सुना कि उनमें से एक बहुत बीमार है। मैं अपने गाँव लौट रहा था, सोचा रास्ते में उन लोगों के यहाँ भी होता चलूँ। उनके घर गया तो एक ही भाई से मुलाकात हुई। उसने बताया कि छोटा भाई बीमार था।मित्र ने कहा, “तुम्हारे दिल में कितना स्नेह है। हम लोगों का ख़याल कर इतनी दूर से मिलने के लिए आए हो। अब छोटे भाई की तबीयत ठीक है। उसे सरकारी नौकरी मिल गई है, वहीं गया है।” बड़े भाई ने हँसते-हँसते दो मोटी-मोटी जिल्दों में लिखी डायरी मुझे दिखाई और बोला कि अगर कोई इस डायरी को पढ़ ले तो भाई की बीमारी का रहस्य समझ जाएगा और अपने पुराने दोस्त को दिखा देने में हर्ज़ भी क्या है। मैं डायरी ले आया और उसे पढ़ डाला। समझ गया कि बेचारा नौजवान अजीब आतंक और मानसिक यंत्रणा से पीड़ित था। लिखावट बहुत उलझी-उलझी और असंबद्ध थी। कुछ बेसिरपैर के आरोप भी थे। पृष्ठों पर तारीखें नहीं थीं। जगह-जगह स्याही के रंग और लिखावट के अंतर से अनुमान हो सकता था कि ये जब-तब आगे-पीछे लिखी गई चीज़ें होंगी। कुछ बातें संबद्ध भी जान पड़ती थीं और समझ में आ जाती थीं। चिकित्सा विज्ञान में ख़ोज की दृष्टि से उपयोगी हो सकने वाले कुछ पृष्ठों को मैंने नकल कर लिया। डायरी की एक भी बेतुकी बात को मैंने बदला नहीं, बस नाम बदल दिए हैं। हालाँकि दूर देहात के उन लोगों को जानता भी कौन है। शीर्षक स्वयं लेखक का ही दिया हुआ है। यह दिमाग़ ठिकाने आ जाने पर ही दिया होगा। मैंने उसे नहीं बदला।1आज रात चाँद ख़ूब उजला है।

तीस वर्ष हो गए, चाँद को नहीं देख पाया। इसलिए आज इस चाँदनी में मन में उत्साह उमड़ता जा रहा है। आज अनुभव कर रहा हूँ कि बीते तीस वर्ष अंधकार में ही बिता दिए; परंतु अब बहुत चौकस रहना होगा। अवश्य कोई बात है। वरना चाओ परिवार का कुत्ता भला दो बार मेरी ओर क्यों घूरता?

हाँ, समझता हूँ, मेरी आशंका अकारण नहीं है।2आज अंधेरी रात है। चाँद का कहीं पता नहीं। लक्षण शुभ नहीं हैं। आज सुबह बाहर गया तो बहुत सावधान था। चाओ साहब ने मेरी ओर ऐसे देखा, मानो मुझे देखकर डर गए हों, मानो मेरा ख़ून करना चाहते हों। सात-आठ दूसरे लोग भी थे। एक-दूसरे से फुसफुसाकर मेरी बात कर रहे थे और मेरी नज़र से बचने की कोशिश कर रहे थे। जितने लोग मिले, सबका वही हाल था। उनमें जो सबसे डरावना था, मुझे देखते ही दाँत निकालकर हँसने लगा। मैं सिर से पाँव तक काँप पड़ा। समझ गया, इन लोगों ने सब तैयारी कर ली है।मैं डरा नहीं, अपनी राह चलता गया। कुछ बच्चे आगे-आगे जा रहे थे। वे भी मेरी ही बात कर रहे थे। उनकी नज़रें चाओ साहब की ही तरह थीं और चेहरे डर से ज़र्द पड़ गए थे। सोच रहा था, मैंने इन लड़कों का क्या बिगाड़ा है? ये “क्यों, क्या बात है?” क्यों मुझसे ख़फ़ा हैं? रहा नहीं गया तो मैं पुकार बैठा, मगर तब वे सब भाग गए।कुछ समझ नहीं पाता कि चाओ साहब से मेरा क्या झगड़ा है? राह चलते लोगों का मैंने कब क्या बिगाड़ा है? बस, इतना याद है कि बीस वर्ष पहले कू च्यू साहब की वर्षों पुरानी बही पर मेरा पाँव पड़ गया था और कू साहब बहुत नाराज़ हो गए थे। पर कू का चाओ से क्या मतलब? एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं। हो सकता है, चाओ ने इसके बारे में किसी से सुन लिया हो और मुझसे उसका बदला लेने की ठान ली हो। वह राह चलते लोगों को मेरे विरुद्ध भड़काते रहते हैं; पर इन बच्चों को इस सबसे क्या मतलब? ये लोग तो तब पैदा भी नहीं हुए थे। ये लोग मुझे ऐसे घूर-घूर कर क्यों देखते हैं? मानो डरे हुए हों, मेरा ख़ून कर देने की घात में हों। बहुत घबराहट होती है, क्या करूँ? अजब परेशानी है।मैं समझता हूँ इन लोगों ने यह सब ज़रूर अपने माँ-बाप से सीख लिया होगा!3रात में नींद नहीं आती। बिना अच्छी तरह सोचे-विचारे कोई भी बात समझ में नहीं आ सकती।इन लोगों को देखो—कई लोगों को मजिस्ट्रेट कठघरे में बंद करवा चुका है; बहुत से लोग आसपास के अमीर-उमरावों से मार खा चुके हैं; बहुतों की बीवियों को सरकारी अमले के लोग छीन ले गए हैं; कइयों के माँ-बाप साहूकारों से परेशान होकर गले में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर चुके हैं। पर इन सब बातों को याद करके भी इन लोगों की आँखों में कभी इतना ख़ून नहीं उतरा होगा, इन्हें कभी इतना ग़ुस्सा नहीं आया होगा, जितना कि कल देखने में आया।उस औरत को क्या कहूँ? कल गली में अपने लड़के को पीट-पीटकर चीख़ रही थी, “बदमाश कहीं का! तेरी चमड़ी उधेड़ दूँगी! तेरी बोटी-बोटी काट डालूँगी! तूने मेरा कलेजा जला दिया!” वह बार-बार मेरी तरफ़ देखने लगती थी। मैं काँप उठा, बड़ी घबराहट हुई। क्रूर चेहरे, लंबे-लंबे दाँतों वाले लोग हँसने लगे। बुजुर्ग छन झट आगे बढ़ आया और मुझे पकड़कर घर ले आया।छन मुझे घर लिवा लाया। सब लोग ऐसे बन गए मानो पहचानते ही न हों। मैंने उनकी आँखें पहचानीं। उनकी नज़रों में भी वही गली के लोगों वाली बात थी। मैं अध्ययन-कक्ष में आ गया तो उन्होंने झट दरवाज़ा बंद कर दिया और साँकल लगा दी, जैसे मुर्ग़ी या बत्तख़ को दरबे में बंद कर दिया गया हो। मैं और भी परेशान हो गया।कुछ दिन पहले की बात है। शिशु-भेड़िया गाँव से हमारा एक असामी फसल के चौपट होने की ख़बर देने आया था। उसने मेरे बड़े भाई को बताया कि गाँव के सब लोगों ने मिलकर देहात के एक बदनाम दिलेर गुंडे को घेर लिया और मार-मारकर उसका काम तमाम कर दिया। कुछ लोगों ने उसका सीना फाड़कर दिल और कलेजा निकाल लिया, उन्हें तेल में तला और बांटकर खा गए कि उनका भी  हौसला बढ़ जाए। मुझसे रहा नहीं गया और मैं बोल पड़ा। भैया और असामी दोनों मुझे घूरने लगे। बिलकुल ऐसे ही घूर रहे थे, जैसे आज सड़क पर लोगों की नज़रें।यह सब सोचकर एड़ी से चोटी तक सारा बदन सिहर उठता है।ये लोग आदमखोर हैं, ये मुझे भी खा सकते हैं।याद आया, वह औरत कह रही थी, “तेरी बोटी-बोटी काट डालूँगी!” क्रूर चेहरों पर लंबे दाँत निकाले लोग हँस रहे थे, और उस असामी ने जो कहानी सुनाई...ये सब गुप्त संकेत हैं। इन लोगों की बातों में कितना विष भरा है। इनकी हँसी खंजर की धार की तरह काटती है। इनके ये लंबे-लंबे सफ़ेद दाँत आदमियों के हाड़-माँस चबा-चबा कर चमक गए हैं। ये सब आदमखोर हैं।

मैं जानता हूँ, यद्यपि मैं कोई बुरा आदमी नहीं, पर जब से कू साहब की बही पर मेरा पाँव पड़ा है, लोग मेरे पीछे पड़ गए हैं। इन लोगों के मन में ऐसी गांठ पड़ गई है कि मैं कुछ कर ही नहीं सकता। ये लोग किसी से एक बार बिगड़ जाते हैं तो उसे बदमाश समझ लेते हैं। ख़ूब याद है, बड़े भाई मुझे निबंध लिखना सिखाया करते थे। कोई आदमी कितना ही भला रहा हो, यदि मैं उसके दोष दिखा देता तो उन्हें बहुत पसंद आता था। साथ ही यदि मैं किसी के दोषों पर पर्दा डाल देता तो कह बैठते, “बहुत ख़ूब! यह तुम्हारी नई सूझ है।” इन लोगों के मन की थाह कैसे पा सकता हूँ—ख़ासकर जब ये लोग किसी को खा जाने की बात सोच रहे हों।बहुत गहराई से विचार किए बिना कुछ समझ पाना कठिन है। याद पड़ता कि आदिम लोग प्राय: नर-माँस खाते थे, पर बिलकुल ठीक याद नहीं पड़ रहा। इस विषय में इतिहास की पुस्तकों में भी ख़ोज करने का यत्न किया, कहीं क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिला। “सद्गुण और सदाचार” यही शब्द सभी पृष्ठों पर मिलते हैं। नींद किसी तरह नहीं आ रही थी, इसलिए बहुत ध्यान से आधी रात तक पढ़ता रहा। जहाँ-तहाँ वास्तविक अभिप्राय समझ में आने लगा। सारी किताब में सब जगह जगह एक ही बात थी, “मनुष्य को खा जाओ”। पुस्तक में लिखी ये सारी बातें, उस असामी की सारी बातें, मेरी ओर कैसे घूर रही हैं, गूढ़ मुस्कुराहट से!मैं भी तो मनुष्य हूँ और ये लोग मुझे खा जाना चाहते हैं।4सुबह कुछ देर से चुपचाप बैठा था। न खाना लेकर कमरे में आया—एक कटोरे में सब्ज़ी थी, दूसरे में भाप से पकाई हुई मछली। मछली की आँखें पथराई हुई सफ़ेद थीं, मुँह खुला हुआ था, जैसे कोई भूखा आदमखोर मुँह खोले हुए हो। मैं खाने लगा, ग्रास निगलता जा रहा था। नहीं मालूम मछली खा रहा या नर-माँस। सब उगल डाला।मैंने छन से कहा, “छन दादा, भैया से कहो इस कोठरी में मेरा दम घुटा जा रहा है, ज़रा आँगन में टहलूँगा।” छन चुपचाप चला गया। तुरंत ही लौटकर आया और उसने दरवाज़ा खोल दिया।मैं कोठरी में ही बैठा रहा, उठा नहीं। सोच रहा था, ये लोग अब क्या करेंगे? यह तो जानता था कि मुझे हाथ से निकल नहीं जाने देंगे। इतना तो निश्चित था। भैया आहिस्ता-आहिस्ता क़दम रखते एक बुजुर्ग को साथ लिए आ पहुँचे। बुड्ढे की ख़ून की प्यासी आँखों में कटार की-सी चमक थी। वह मुझसे आँख नहीं मिलाना चाहता था कि कहीं मैं ताड़ न लूँ, इसलिए गर्दन झुकाए था। चश्मे के भीतर से कनखियों से मेरी ओर देख लेता था।

“आज तो तुम्हारी तबीयत बहुत अच्छी लग रही है।” भैया बोले।मैंने हामी भरी।

“तुम्हें दिखाने के लिए ही हो साहब को बुलवाया है।” भैया ने कहा।

“बहुत अच्छा,” मैंने कहा, पर समझ गया कि यह बुड्ढा असल में एक जल्लाद है, जो हकीम बनकर आया है! मेरी नब्ज़ देखने के बहाने वह मुझे टटोलकर माँस का अनुमान लगा रहा था। इस सेवा के लिए उसे भी मेरे माँस का हिस्सा पाने की आशा थी। इस पर भी मैं डरा नहीं। मैं आदमखोर नहीं हूँ, पर उन लोगों से अधिक साहस मुझमें है। मैंने अपनी दोनों कलाइयाँ आगे बढ़ा दीं, यह सोचकर कि देखूँ क्या करता है? बुड्ढा चौकी पर बैठ गया, आँखें मूँदे मेरी नब्ज़ देखता रहा। कुछ देर सोच में मौन रहा, फिर अपनी धूर्त आँखें खोलकर बोला, “अपने विचारों को भटकने मत दो, फ़िक्र बिलकुल मत करो। कुछ दिनों तक पूरा आराम करो। चैन से रहो, तुम्हारी सेहत बिलकुल ठीक हो जाएगी।”अपने विचारों को भटकने मत दो! बिलकुल फ़िक्र मत करो! कुछ दिन पूरा आराम करो! चैन से रहो! हाँ, जब मैं ख़ूब मोटा हो जाऊँगा तो इन्हें ख़ूब माँस मिलेगा, पर मुझे इससे क्या मिलेगा? यह क्या सेहत का ठीक होना है? यह इन सब आदमखोरों का नर-माँस के लिए लालच और साथ ही भलमनसाहत का दिखावा है। कायरता के कारण ये लोग तुरंत कार्यवाही करने का साहस नहीं कर पाते—यह देखकर हँसी के मारे पेट में बल पड़ने लगते हैं। मेरी हँसी रुक न सकी और मैं ठहाका लगाकर हँस पड़ा। ख़ूब मज़ा आया। मैं जानता था इस हँसी में निर्भीकता और सत्यनिष्ठा छिपी है। भैया और बूढ़े हकीम के चेहरे पीले पड़ गए। वे लोग मेरी निर्भीकता और सत्यनिष्ठा देखकर डर गए।मैं निडर हूँ, साहसी हूँ, इसीलिए तो वे लोग मुझे खा जाने के लिए और अधिक आतुर है, ताकि मेरा दमदार कलेजा खाकर उनका हौसला और बढ़ सके। बूढ़ा हकीम उठकर चल दिया। जाते-जाते भैया के कान में कहता गया, “इसे अभी खाना है!” भैया ने सिर झुकाकर हामी भर ली। अब समझ में आया! विकट रहस्य खुल गया। मन को धक्का तो लगा, पर यह तो होना ही था। मुझे मालूम ही था—मेरा अपना ही भाई मुझे खा डालने के षड्यंत्र में शामिल है!यह आदमखोर मेरा अपना ही बड़ा भाई है!मैं एक आदमखोर का छोटा भाई हूँ!मुझे दूसरे लोग खा जाएँगे, लेकिन फिर भी मैं एक आदमखोर का छोटा भाई हूँ!5कुछ दिनों से दूसरी ही बात मन में आ रही है—हो सकता है हकीम के वेष में बूढ़ा जल्लाद न हो, हकीम ही हो; अगर ऐसा भी है तो भी वह आदमखोर तो है ही। वैद्यों के पुरखे ली शी-चन की जड़ी-बूटियों की पोथी में साफ़ लिखा है कि नर-माँस को उबालकर खाया जा सकता है; सो वह वैद्य आदमखोर नहीं तो क्या है?बड़े भाई का क्या कहना, वे तो आदमखोर हैं ही। जब मुझे पढ़ाते थे तो अपने मुँह से कहते थे, “लोग अपने बेटों को एक दूसरे से बदलकर उन्हें खा जाते हैं” और एक बार एक बदमाश के लिए उन्होंने कहा था कि उसे मार डालने से ही क्या होगा, “उसका गोश्त खा डालें और उसकी खाल को बिछावन बना लें!’’ तब मेरी उम्र कच्ची थी। सुनकर दिल देर तक धड़कता रहा। जब शिशु-भेड़िया गाँव के असामी ने एक बदमाश का कलेजा निकालकर खा जाने की बात कही थी, तब भी भैया को कुछ बुरा नहीं लगा था। सुनकर चुपचाप सिर हिलाते रहे थे, जैसे ठीक ही हुआ हो। मुझसे छिपा क्या है, वे तो पहले की ही तरह खूँखार हैं। चूँकि “बेटों को एक-दूसरे से बदलकर उन्हें खा जाना” संभव है, तो फिर हर चीज़ को बदला जा सकता है, हर किसी को खाया जा सकता है। उन दिनों भैया जब ऐसी बातें समझाते थे तो मैं सुन लेता था, सोचता नहीं था। पर अब ख़ूब समझ में आता है कि ऐसी बातें कहते समय उनके मुँह में नर-माँस का स्वाद भर आता होगा और उनका मन मनुष्य को खाने के लिए व्याकुल हो उठता होगा।6घना अंधेरा है। जान नहीं पड़ता रात है या दिन। चाओ परिवार का कुत्ता फिर भौंक रहा है। बब्बरशेर की तरह खूँखार, खरहे की तरह कातर, लोमड़ी की तरह धूर्त।

मैं उन लोगों को ख़ूब जानता हूँ। किसी को एकदम मार डालने को ये तैयार नहीं है। ऐसा कर सकने का साहस इन लोगों में नहीं है।

परिणाम के भय से इनकी जान निकलती है, इसलिए ये लोग षड्यंत्र रचकर जाल बिछा रहे हैं, मुझे आत्महत्या कर लेने के लिए विवश कर रहे हैं। कुछ दिनों से गली के पुरुषों और स्त्रियों का बरताव देख रहा हूँ और बड़े भाई का रंग-ढंग भी देख रहा हूँ। मैं सब समझता हूँ। ये लोग तो चाहते हैं कि कोई घर की धन्नी से फँदा लगाकर इनके लिए मर जाए। क़त्ल के लिए कोई इन पर उँगली न उठा सके और ये लोग जी भरकर खाएँ। ये लोग इसी बात की कल्पना करके ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे। चाहे कोई आदमी चिंता और संकट से सूख-सूख कर आत्महत्या कर ले और उसके शरीर में रक्त-माँस कुछ भी न रहे, ये लोग उसे भी खाने के लिए लालायित रहते हैं।ये लोग केवल मुरदार गोश्त खाते हैं! याद आता है, एक घिनौने जानवर के बारे में पढ़ा है। उसकी आँखें बड़ी डरावनी होती हैं। हाँ, उसे लकड़बग्घा कहते हैं। लकड़बग्घा अक्सर मुरदार गोश्त खाता है। मोटी से मोटी हड्डी दांतों में चबाकर निगल जाता है। ख़याल आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लकड़बग्घे की जाति भेड़िये से मिलती है और भेड़िया कुत्ते की जाति का होता है। उस दिन चाओ परिवार का कुत्ता बार-बार मेरी ओर देख रहा था। मालूम होता था वह कुत्ता भी षड्यंत्र में शामिल है। बूढ़ा हकीम नजरें झुकाए था, पर मैं तो ताड़ गया!सबसे अधिक दुख तो मुझे अपने बड़े भाई के लिए है। वह भी तो आदमी है, उसे डर क्यों नहीं लगता। मुझे खा डालने के लिए वह भी दूसरों के साथ क्यों मिल गया है! शायद जो होता चला आया है उसे करते जाने में लोग अपराध और दोष नहीं समझते। या मेरा भाई जानता है कि यह अपराध है, पाप है, पर उसने पाप करने के लिए अपना दिल पत्थर-सा बना लिया है?सबसे पहले मैं इसी आदमखोर का भण्डाफोड़ करूँगा। सबसे पहले इसी को पाप से रोकूँगा।

8वास्तव में तो यह तर्क बहुत पहले ही मान लिया जाना चाहिए था...अचानक कोई भीतर आ गया। यही बीस-एक वर्ष का नौजवान होगा। चेहरा उसका ठीक-ठीक नहीं देख सका। उस पर मुस्कुराहट खेल रही थी। लेकिन जब उसने गर्दन झुकाकर मेरा अभिवादन किया तो उसकी मुस्कान बनावटी-सी लगी। मैंने पूछ ही लिया, “बताओ नर-माँस खाना उचित है?”वह मुस्कुराता रहा और बोला, “क्या कहीं अकाल पड़ा है, नर-माँस कोई क्यों खाएगा?”मैं भाँप गया, यह भी उन्हीं के दल का था। मैंने साहस किया और फिर कहा—
“मेरी बात का उत्तर दो!”

“आख़िर इस प्रश्न का मतलब क्या है? ...क्या मज़ाक कर रहे हो? ...कितना सुहावना मौसम है!”

“हाँ मौसम अच्छा है, चाँदनी ख़ूब उजली है। पर तुम मेरी बात का जवाब दो, क्या यह उचित है?”वह कुछ परेशान हो गया और बोला —“नहीं।”

“नहीं, तो फिर लोग ऐसा क्यों करते हैं?”

“तुम्हारा मतलब क्या है?”

“मेरा मतलब? शिशु-भेड़िया गाँव में लोग नर-माँस खा रहे हैं। तुम पोथियाँ-ग्रंथ उठाकर देख लो। सब जगह यही लिखा है, ताज़ा लाल-लाल अक्षरों में।”वह गुमसुम रह गया। उसका चेहरा पीला पड़ गया। मेरी ओर घूरकर बोला, “होगा, सदा से ही होता आया है।

“सदा से होता आया है, क्या इसीलिए उचित है?”

“मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता। तुम्हें भी इन फिजूल के झगड़ों में नहीं पड़ना चाहिए। ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए।”मैं झट से उछल पड़ा, आँखें फाड़कर इधर-उधर देखने लगा। वह आदमी ग़ायब हो गया था। मैं पसीना-पसीना हो रहा था। नौजवान की उम्र मेरे भाई से बहुत कम थी, मगर वह भी उन लोगों के साथ था। अपने माँ-बाप से सब सीख लिया है उसने, भगवान जाने, अपने बेटे को भी सिखा चुका होगा! तभी तो ये ज़रा-ज़रा से छोकरे मुझे यों घूर-घूर कर देखते हैं।9दूसरों को खा लेने का लालच, परन्तु स्वयं आहार बन जाने का भय। सबको दूसरों पर संदेह है, सब दूसरों से आशंकित हैं।..यदि इस परस्पर भय से लोगों को मुक्ति मिल सके तो वे निश्शंक होकर काम कर सकते हैं, घूम-फिर सकते हैं, खा-पी सकते हैं, चैन की नींद सो सकते हैं। बस, मन से वह एक विचार निकाल देने की ज़रूरत है। परंतु लोग यह कर नहीं पाते और बाप-बेटे, पति-पत्नी, भाई-भाई, मित्र, गुरु-शिष्य, एक दूसरे के जानी दुश्मन और यहाँ तक कि अपरिचित भी एक-दूसरे को खा जाने के षड्यंत्र में शामिल हैं, दूसरों को भी इसमें घसीट रहे हैं और इस चक्कर से निकल जाने को कोई तैयार नहीं।10आज सुबह बड़े भैया से मिलने गया। वे ड्योढ़ी के सामने खड़े आकाश की ओर ताक रहे थे। मैं उनके पीछे दरवाज़े और उनके बीच खड़ा हो गया। बहुत ही विनय से बोला—
“हाँ, कहो क्या है?” उन्होंने तुरंत मेरी ओर घूमकर सिर हिलाते हुए इजाज़त दी।

“बात कुछ ख़ास नहीं है, पर कह नहीं पा रहा हूँ। भैया, आदिम अवस्था में तो शायद सभी लोग थोड़ा-बहुत नर-माँस खा लेते होंगे। जब लोगों का जीवन बदला, उनके विचार बदले, तो उन्होंने नर-माँस त्याग दिया। वे लोग अपना जीवन सुधारना चाहते थे। इसलिए वे सभ्य बन गए, उनमें मानवता आ गई। परंतु कुछ लोग अब भी खाए जा रहे हैं—मगरमच्छों की तरह। कहते हैं जीवों का विकास होता है, एक जीव से दूसरा जीव बन जाता है। कुछ जीव विकास करके मछली बन गए हैं, पक्षी बन गए हैं, बंदर बन गए हैं। ऐसे ही आदमी भी बन गया है। परंतु कुछ जीवों में विकास की इच्छा नहीं होती। उनका विकास नहीं होता, वे सुधरते ही नहीं, रेंगने वाले जानवर ही बने रहते हैं। नर-माँस खाने वाले असभ्य लोग नर-माँस न खाने वाले मनुष्यों की तुलना में कितना नीचे और लज्जित अनुभव करते होंगे। बंदर की तुलना में रेंगने वाले जानवर नीचे हैं, परंतु नर-माँस न खाने वाले सभ्य लोगों की तुलना में नर-माँस खाने वाले लोग उनसे भी नीचे हैं।

“पुराने समय में ई या ने अपने बेटे को उबालकर च्ये और चओ के सामने परोस दिया था। यह एक पुरानी कहानी है। इससे पहले भी जिस दिन से फान कू ने आकाश और पृथ्वी बनाए हैं, ई या के बेटे के ज़माने से श्वी शी-लिन के ज़माने तक मनुष्य एक दूसरे को खाते रहे हैं। श्वी शी-लिन के ज़माने से शिशु-भेड़िया गाँव में पकड़े गए आदमी के जमाने तक यही होता रहा है। पिछले साल शहर में एक अपराधी की गर्दन काट दी गई थी। ख़ून बहता देखकर तपेदिक के एक मरीज़ ने उसके ख़ून में रोटी डुबोकर खा ली थी।

“ये लोग मुझे खा जाना चाहते हैं। इन सब लोगों को अकेले रोक पाना तुम्हारे बस का नहीं; पर तुम उनमें क्यों मिल गए हो? ये लोग आदमखोर ठहरे, जो न कर डालें! ये मुझे खा डालेंगे, उसके बाद तुम्हारी भी बारी आएगी। फिर ये लोग आपस में भी एक-दूसरे को नहीं छोड़ेंगे। भैया, अगर तुम लोग आज ही यह रास्ता छोड़ दो, तो सबको चैन मिल जाएगा। माना, बहुत-बहुत पुराने समय से ऐसा ही होता चला आया है, आदमी आदमी को खाता आया है। पर अब, ख़ासकर इस समय तो हम लोग आपस में एक-दूसरे पर दया कर सकते हैं और कह सकते हैं कि ऐसा नहीं होगा! भैया मुझे विश्वास है कि तुम ऐसा कहोगे। अभी उस दिन वह असामी लगान घटा देने के लिए कह रहा था। तब भी तुमने कह दिया था, ऐसा नहीं हो सकता।”भैया पहले तो बेपरवाही दिखाने को मुस्कुराते रहे, फिर उनकी आँखों में ख़ून उतर आया। जब मैंने उनका भंडाफोड़ कर दिया तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। ड्योढ़ी के बाहर कई लोग जमा थे। चाओ साहब भी अपना कुत्ता लिए खड़े थे सब लोग गर्दनें बढ़ा-बढ़ा कर बड़ी उत्सुकता से भीतर झाँक रहे थे। मैं उनके चेहरे नहीं देख पा रहा था। लगता था कई लोग कपड़े से चेहरा छिपाए हैं। कुछ के चेहरे ज़र्द और डरावने लग रहे थे, कुछ अपनी हँसी दबाए थे। मैं जानता था वे सब आदमखोर हैं, आपस में मिले हुए हैं। पर उनमें आपस में भी एका और मेल कहाँ था। कुछ का ख़याल था कि आदमखोरी सदा से होती आई है और यह कोई बुरी बात नहीं। कुछ मानते थे कि यह अत्याचार है, पर अपना लालच दबा नहीं पाते थे। चाहते थे कि उनका भेद न खुले, इसलिए मेरी बात सुनी तो उन्हें ग़ुस्सा आ गया। पर अपने ग़ुस्से को क़ाबू कर वे होंठ दबाए मुस्कुराते रहे।भैया एक़दम ताव में आ गए और ज़ोर से चिल्ला उठे—
“चलो यहाँ से, भाग जाओ सब लोग! किसी का दिमाग़ ख़राब हो गया है और तुम उसका तमाशा देखने आए हो!”मैं उन लोगों की चाल भाँपने लगा था। ये लोग अपनी राह से टलने वाले नहीं, इन लोगों ने पूरा षड्यंत्र रच लिया है। सबने मिलकर मुझे पागल समझ लिया है। ये लोग मुझे ख़त्म कर देंगे तो कोई कुछ कहेगा भी नहीं। सब यही समझेंगे कि पगला था, उसे निबटा दिया। ठीक किया। जब शिशु-भेड़िया गाँव के असामी ने एक बदमाश को मारकर खा जाने की बात कही थी, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा था। तब भी इन लोगों ने यही चाल चली थी। यह इन लोगों की एक पुरानी चाल है।छन भी भीतर चला आया। वह भी बहुत गरम हो रहा था, पर वे लोग मेरा मुँह बंद नहीं कर सके। मैं बोले बिना नहीं माना—

“यह ठीक नहीं है, ऐसा मत करो। तुम्हें अपना मन बदलना होगा,” मैंने कहा, “समझ लो, यह अन्याय नहीं चल सकेगा। भविष्य में दुनिया में आदमखोरी नहीं चल सकेगी।”

“अगर आदमखोरी नहीं छोड़ोगे तो तुम सब ख़त्म हो जाओगे, एक-दूसरे को खा जाओगे। तुम्हारे घरों में चाहे जितनी संतानें पैदा हों, सभ्य लोग तुम्हें समाप्त कर देंगे। जैसे शिकारी जंगल में भेड़ियों को समाप्त कर देते हैं, जैसे लोग साँपों को ख़त्म कर देते हैं।”छन दादा ने सब लोगों को भगा दिया। भैया चले गए थे। छन ने मुझे कमरे में जाने को कहा। कमरे में घुप अंधेरा था। सिर के ऊपर छत की धनियाँ और कड़ियाँ थिरकती जान पड़ रही थीं। उनका आकार बढ़ता जा रहा था। कुछ पल ऐसे भी खड़खड़ाहट होती रही, फिर छत मुझ पर आ गिरी।छत के बोझ के नीचे हिल सकना संभव नहीं था। वे लोग तो चाहते ही थे कि मैं मर जाऊँ। मैं जानता था कि यह बोझ महज़ ख़याली ही है। इसलिए हिम्मत बाँधी, कंधा लगाया और बाहर निकल आया। मैं पसीना-पसीना हो रहा था, परंतु फिर भी बोले बिना न रह सका—

“तुम्हें तुरंत बदलना होगा! अपना मन बदलना होगा! याद रखो, भविष्य में दुनिया में आदमखोरी नहीं चल सकेगी...”11कोठरी का दरवाज़ा बंद रहता है। कभी धूप नहीं दिखाई देती। रोज़ाना दो बार खाना मिल जाता है।मैंने खाना खाने को चापस्टिकें उठाईं तो भैया का ख़याल आ गया, अपनी छोटी बहन की मृत्यु की घटना याद आ गई। वह भैया की ही करतूत थी। तब मेरी बहन केवल पाँच ही वर्ष की थी। कितनी प्यारी और निरीह थी वह! याद आती है तो चेहरा आँखों के सामने घूम जाता है। माँ रो-रो कर बेहाल हो रही थीं।भैया माँ को सांत्वना देकर समझा रहे थे, कारण शायद यह था कि स्वयं ही बेचारी को खा गए थे, इसलिए माँ को इस तरह रोते देखकर उन्हें शर्म आ रही थी। अगर उनमें शर्म होती...भैया मेरी बहन को खा गए थे! नहीं मालूम माँ यह भेद जान सकी थीं या नहीं।मेरा तो ख़याल है कि माँ सब जानती थीं, पर जब माँ रो रही थीं तो उन्होंने साफ़-साफ़ कुछ भी नहीं कहा था। शायद यह सोचकर चुप रही थीं कि कहने की बात नहीं थी। एक घटना और याद है। तब मेरी उम्र चार या पाँच वर्ष रही होगी। मैं आँगन में छाँह में बैठा हुआ था। भैया ने कहा था—एक सपूत का कर्तव्य है कि अपने माता-पिता के बीमार होने पर उनकी औषधि के लिए यदि ज़रूरत हो तो अपने शरीर का माँस भी काटकर और उबालकर प्रस्तुत कर दे। माँ उनकी बात सुनकर समर्थन में चुप रह गई थीं, उन्होंने कोई विरोध नहीं किया था। अगर नर-माँस का एक टुकड़ा खाया जा सकता है, तो पूरे आदमी को भी खाया जा सकता है। और जब माँ के शोक और रुदन की याद आती है तो कलेजा टुकड़े-टुकड़े होने लगता है। कितने निराले ढंग हैं इन लोगों के!12उसे याद करते ही, सोचते ही, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सिर चकरा जाता है। आख़िर यह बात समझ में आई कि उम्रभर से ऐसे लोगों के बीच रह रहा हूँ जो चार हज़ार वर्ष से नर-माँस का आहार करते आ रहे हैं। बड़े भैया ने अभी घर सँभाला ही था कि कुछ दिन बाद छोटी बहन की मृत्यु हो गई। इन्होंने उसके माँस का उपयोग किया ही होगा, पुलाव में या दूसरी तरह। बेखबरी में हम लोग भी खा गए होंगे।संभव है, अनजाने में मैंने अपनी बहन के माँस के कई टुकड़े खा लिए हों, और अब मेरी बारी आई है।...मैं भले ही बेख़बर रहा हूँ, मेरे पुरखे चार हज़ार वर्ष से आदमखोर रहे हैं। मेरे जैसा आदमी किसी सभ्य, वास्तविक मानव को अपना मुँह कैसे दिखा सकता है?13संभव है नई पीढ़ी के छोटे बच्चों ने अभी नर-माँस न खाया हो।इन बच्चों को तो बचा लें!

-लू शुन

[विश्व की श्रेष्ठ कहानियाँ (खण्ड-2), संपादक : ममता कालिया, लोकभारती प्रकाशन 2005]