याद बहुत आती है
 
एकाकी प्रहरों में याद बहुत आती है। 
बेकली बढ़ाती है।
 
समझा कर हार गया किन्तु नहीं माना मन, 
रूप किरन पाने को मचल मचल जाता मन; 
नींद निगोड़ी मेरे पास नहीं आती है। 
पल-पल तरसाती है। 
याद बहुत आती है ।।
 
नयनों के द्वार खड़े सपने सकुचाते हैं 
पलकों तक आ-आकर लौट-लौट जाते हैं 
आँसू के सरगम पर पीड़ा खुद गाती है 
लोरियाँ सुनाती है।
याद बहुत आती है॥
 
- विष्णु कुमार त्रिपाठी राकेश