जो कुछ मुझपर बीत रही है कह न सकूंगा है मजबूरी।
पूरब पश्चिम एक कर दिए मिट न सकी फिर भी
वह दूरी।
जिसको मैंने व्यथा सुनायी उसने ही उपहास किया है—
अब जग से मुझको भय लगता मेरी जीवन कथा न पछो ।
मुझसे मेरी व्यथा न पूछो ।
ज्योंही बढ़ा एक पग आगे खींचा गया दूसरा पीछे।
नजरों पर चढ़ गया रहा यदि दो पल पलक के नीचे ।
हित भी तो अनहित हो जाता नेकी करो बदी मिलती है—
यहां व्याप्त शंका कण कण में तुम इस जग की प्रथा
न पूछो ।।
सोच रहा था सब अपने हैं, अपनों से फिर कैसा अंतर ।
पर अपने बन गए पराए कांप उठा आकुल अभ्यांतर ।
माप सको दुख की गहराई, यदि तुममें इतना है साहस—
दो क्षण तुम मेरे संग रह लो डर पीड़ा अन्यथा न पूछो ।
मुझसे मेरी व्यथा न पूछो ।।
-गणेश शंकर शुक्ल 'बंधु'