मॉरीशस एक छोटा सा द्वीप है, लेकिन इसका मूड़िया पहाड़ इतना ऊँचा और प्रभावशाली है कि देश के किसी भी कोने से इसे देखा जा सकता है। यह ऐसा दिखता है, मानो कोई पाषाणी मानव हो। आप मॉरीशस का भ्रमण कर रहे हों तो ऐसा संभव ही नहीं कि आप इसकी ओर आकृष्ट न हों। यूं तो इस पर्वत का नाम 'पीटर बॉथ' है लेकिन स्थानीय लोग इसे इसके आकार और जनश्रुति के कारण 'मूड़िया पहाड़'  ही कहते हैं।  कठोर ऊंची चट्टानों के के बीच एक दर्दभरी प्रेम कहानी छिपी है, जो आज भी मॉरीशस के गांवों में सुनाई जाती है।
 
कहते हैं, मॉरीशस के पूर्वी तट पर एक सुंदर, शांत गाँव बसा हुआ था। उसके चरणों को समुद्र का नीला जल धोता, और पश्चिम की ओर विशाल पर्वत उसके मुकुट-सा शोभायमान रहता। यहाँ की कलकल करती नदियाँ, अपनी मस्ती में निर्मल बहते झरने और यहाँ के जंगल सुगंधित फूलों और रसीले फलों से लदे रहते। गाँव के लोग गन्ने और फलों की खेती करते, और अपनी सरल जीवनशैली में मग्न रहते।
 
इसी गाँव में  एक अल्हड़, तेजस्वी युवक—जिसकी चाल में झरनों सी मस्ती थी, स्वभाव में नदियों की बेफिक्री, आँखों में समुद्र की गहराई, और वाणी में गन्ने की मिठास। जब पूर्णिमा की रातें आतीं, और मॉरीशस की पहाड़ियों पर चाँदनी बिखर जाती, तब उसकी बांसुरी की मधुर तान घाटियों में गूंज उठती। कहते हैं, उसकी इसी बांसुरी की धुन पर एक स्वर्गीय परी मोहित हो गई।
 
"ओह! तुम कितनी सुंदर बांसुरी बजाते हो, ऐसा लगता है जैसे साक्षात कृष्ण कन्हैया मॉरीशस की धरती पर उतर आए हों।" परी ने अचानक प्रकट होकर अपनी प्रसन्नता जतायी। 
 
अचानक आई आवाज से युवक की बांसुरी की तान में व्यवधान पड़ गया। युवक ने सिर उठाकर चौंककर पूछा, "तुम कौन हो? हमारे गाँव की तो नहीं लगती?"
 
"मैं आसमान से आई हूँ। एक बार फिर बांसुरी बजाओ न!" परी ने मुसकुराते हुए आग्रह किया। 
 
युवक ने चुटकी ली, "पहले तुम परियों का नृत्य दिखाओ!"
 
परी खिलखिलाई, "सच? देखना चाहोगे परियों का नाच? चलो मेरे साथ।"
 
उसने पर्वत की चोटी की ओर इशारा किया, "रात के ठीक बारह बजे वहाँ हम परियाँ नृत्य करती हैं। देखना चाहते हो तो मेरे साथ चलो।"
 
उस रात से, हर आधी रात, वह युवक पहाड़ की चोटी पर जाने लगा। वहाँ परियों के नृत्य का जादू उसे बाँध लेता।  युवक की मस्ती जैसे गायब हो चुकी थी। वह दिनभर खोया-खोया रहता और संध्या होते ही पहाड़ की ओर चल देता। परियों ने भी उसे स्वीकार कर लिया, पर एक शर्त रखी—"इस रहस्य को कभी किसी से साझा मत करना, वरना विनाश निश्चित है।"
 
समय बीतता गया। युवक की शादी हो गई, लेकिन उसका मन परियों के नृत्य में ही अटका रहा। हर रात वह घर से निकल जाता, और उसकी नवविवाहिता पत्नी प्रतीक्षा में दीपक की लौ तकती रहती।
 
आखिरकार, पत्नी ने एक दिन पूछ ही लिया, "अगर किसी और से प्रेम था, तो मुझे ब्याहा ही क्यों?"
 
युवक हड़बड़ा गया, "कौन कहता है कि मैं किसी और के पास जाता हूँ?"
 
"तो फिर रात-रात भर कहाँ रहते हो?"
 
"यह मैं नहीं बता सकता," उसने सिर झुका लिया।
 
"सच बताओ, वरना मैं अपनी जान दे दूंगी।"
 
अंततः युवक ने सब कुछ कह सुनाया लेकिन इस स्वीकारोक्ति ने उसका भाग्य बदल दिया।
 
अगली रात जब वह पर्वत की चोटी पर पहुँचा, तो वहाँ केवल एक ही परी खड़ी थी। उसकी आँखों में क्रोध की ज्वाला धधक रही थी।
 
"तुमने हमें धोखा दिया...",  परी का क्रोध सातवें आसमान पर था। 

"मेरी बात...."  युवक की बात पूरी होने से पहले ही परी फिर दहक उठी, "अब इसका दंड भोगो।"
 
परी ने एक हाथ उठाया—युवक का दायाँ हाथ गायब हो गया। फिर दूसरा हाथ उठाया—बायाँ हाथ भी विलीन हो गया।
 
"अब पत्थर बन जाओ, ताकि यह रहस्य किसी और तक न पहुँचे।"
 
कहते हैं, तभी से वह युवक उस पर्वत की चोटी पर पत्थर बनकर खड़ा है। और तब से उस पहाड़ को "मूड़िया पहाड़" कहा जाता है।
 
-रोहित कुमार 'हैप्पी'