मैं नहीं जानता कि कोई आएगा कि नहीं
पर मैंने इस जीवन-जगत से
धरती  नदी, पहाड़ से
चिड़िया, तितली, फूल,  
बादल से और तुमसे प्रेम किया है
इसलिए तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ।
घूमने के लिए पूरी दुनिया है
और लोग घूम भी रहे हैं मीना बाजार से लेकर
आइकाँन टॉवर तक
ताज महल से ताज होटल,
लालकिला, इण्डिया गेट
अजन्ता, एलोरा की गुफाओं तक 
और न जाने कहाँ-कहाँ
सबसे बड़े रॉक, सब से अनोखे फॉल
और सबसे सुंदर फूलों से लदी धरती की वह तलहटी...
पर वह संभव नहीं है, न समय और न गाँठ में पैसे
इसलिए सरसों के उसी पीले खेत में
धूल-माटी वाले अपने घर में
तुम्हारी यादों को संजोए मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ
और सोच रहा हूँ कि जब चीजें एक न एक दिन लौटती हैं
तो तुम भी लौटोगी 
बेगानेपन से उदास होकर
और कहोगी
कि यह मेरा गाँव
यह मेरा बचपन
और यह मेरा छूटा हुआ कोई अंश
दुनिया की हर चीज से सुंदर, अलभ्य, अनमोल!
ढेर सारी खुशियों और प्यार से अह्लादित मैं हसूँगा
अपने जर्जर फेफड़े में हवा खींचकर
गहरे अविश्वास और विस्मय से
और कहूँगा यह वही पेड़ है
जो तुम्हारे लौटने के इन्तजार में बड़ा हुआ
इसकी एक तस्वीर उतारो और साथ में रख लो
यह मंदिर, यह स्कूल, यह सड़क, घर-आँगन  देहरी, और तुलसी-चौड़ा...सब में  तुम्हारी गंध बसी हुई है
अब जब तुम फिर लौटोगी या नहीं
इन चीजों का तुम्हारे साथ होना
अनंत दुनिया में एक जीवंत दुनिया की उपस्थिति
तुम्हें खींच कर लाएगी
और तुम कह सकोगी
कि यह...
हाँ प्रिये! जब  वास्तव में कुछ नहीं बचे
तो उसे स्मृति में बचाना भी एक उपाय है
ताकि तुम कहीं भी लौटो!
 
 -संजय कुमार सिंह
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