पिता के देश
जुगनू, चंदा, सूर्य 
तथा उन्मेष।
 
पिता का प्रेम 
बाल कुशल- क्षेम 
अभिलाषी है।
 
पिता का जाना
जीवन अस्त- व्यस्त 
आँधी का आना।
 
पिता के जाते 
विदा हो गए सभी
रिश्ते औ नाते।
 
पिता हैं बुद्ध
दु:ख- निवृत्ति हेतु
नित्य प्रबुद्ध।
 
पिता हैं कल्कि 
क्षमा ही नहीं बल्कि 
उद्धार करें।
 
पिता हैं कृष्ण 
करें जीवन- प्रश्न 
पल में हल।
 
पिता वशिष्ठ 
धर्म औ नीति पढ़ो 
होओ उत्तिष्ठ। 
 
पिता का क्रोध
जीवन- अवरोध 
मिटाने आता।
 
ले काँधे घूमे 
नदी- गिरि- अरण्य
पिता हैं धन्य।
 
पिता हैं पेड़
सहें हवा की मार 
शाखों से प्यार।
 
पिता हैं माली
करते रखवाली
बाल- बाड़ी की।
 
पिता हैं शिल्पी
शिशु- आलेख गढा
नेह में मढ़ा।
 
पिता हैं स्तंभ 
टूटेंगे सारे दम्भ 
यदि गिरे तो!
 
पिता धरा- से
सौ-सौ भार उठाए 
तो भी मुस्काए।
 
पिता ज्योति- से
रहे स्वयं को बाल
शिशु का ख्याल।
 
पिता नदी- से 
भरी तृषा की प्याली 
कभी न खाली।
 
पिता वट- से 
बाँधे जो दुआ- धागे 
तो विघ्न भागे।
 
पिता तरु- से
जब ताप बरसे
दें घनी छाया।
 
पिता विहान
तिमिर का प्रस्थान
सुनिश्चित है।
 
पिता का प्यार 
मरुथल में वर्षा
मूसलाधार।

-रश्मि विभा त्रिपाठी 
 ई-मेल : rashmivibhatripathi@gmail.com