हिंदी ग़ज़ल की बढ़ती हुई लोकप्रियता में जिन ग़ज़लकारों का महत्वपूर्ण स्थान है, उसमें बिहार के कई ऐसे शायर भी शामिल हैं, जिन्होंने पाबंदी से इस परंपरा को सुदृढ़ किया है। सिर्फ शायरी ही नहीं आलोचनात्मक स्तर पर भी हिंदी ग़ज़ल को स्थापित करने में इनकी महती भूमिका रही है।

जब भी बिहार के ग़ज़लकारों की बात चलती है तो हमारा ध्यान सबसे पहले अनिरुद्ध सिन्हा पर जाता है। उन्होंने जहां गजल पर मौलिक पुस्तकों की रचना की, वहीं ग़ज़ल के आलोचक के तौर पर भी राष्ट्र स्तर पर अपने आप को स्थापित किया। हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा में उनकी किताबें—तिनके भी डराते हैं, तपिश तड़प, तमाशा, हिंदी गजल सौंदर्य और यथार्थ आदि पाठकों के द्वारा हमेशा पसंद की जाती रही है। इधर डॉ. भावना के संपादन में उनके ग़ज़ल -साहित्य पर मुकम्मल किताब भी प्रकाशित हुई है। अनिरुद्ध सिन्हा की ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता और सरलता है। उनकी ग़ज़लों में विरोध का स्वर तो है ही पर इस मुखालफत में भी तल्खी नहीं है। वह नर्म लहजे के शायर हैं। भाषा के प्रति पूरी सावधानी उनकी अपनी शनाख़्त है। वह अपनी ग़ज़ल के दो मिसरे में पूरी कायनात समेट लेते हैं जिसे पढ़ते हुए पाठक मुतासिर हुए बिना नहीं रह पाता। इस संदर्भ में अनिरुद्ध सिन्हा के कुछ शेर देखे जा सकते हैं—

'अगर दरख़्त ना होंगे तो यह समझ लीजै
सफर की धूप में साया कोई नहीं देगा'

'जब से आई है चिड़िया चहकते हुए
मेरे आंगन की सरगम बदलने लगी'

बिहार की हिंदी ग़ज़लकारों में डॉ. भावना ने अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। वह इन दिनों हिंदी ग़ज़ल की एक परिचित नाम हैं। हिंदी ग़ज़ल ही नहीं हिंदी आलोचना को भी उन्होंने बखूबी आजमाया है। 'हिंदी ग़ज़ल के बढ़ते आयाम' जहां उनकी आलोचना की जानी-मानी पुस्तक है, वहीं गजल संग्रह' मेरी मां में बसी है' और 'धुंध में धूप', काफी चर्चित है। उनकी ग़ज़लें विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में भी शामिल की गई हैं। डॉ. भावना की ग़ज़लों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक विडंबना,धार्मिक विद्वेष, ऊंच-नीच, स्त्री और प्रेम है। उन्होंने ग़ज़लें अपने स्वभाव के अनुसार लिखी है, इसलिए वहां पूरी पावनता,पवित्रता और शालीनता दिखाई देती है। उन्होंने अपनी शायरी में मिथकों का भी खूब प्रयोग किया किया है। उदाहरण स्वरूप कुछ शेर देखे जा सकते हैं—

'महामारी को भी अवसर बना दे
भला वो किस तरह का देवता है'

'दर्द देते हो दवा देते हो
प्यार करने की सजा देते हो'

बिहार की महिला ग़ज़लकारों में डॉ.आरती भी लगातार ग़ज़लें लिख रही हैं।  वह ग़ज़ल के साथ मंच पर भी सक्रिय हैं।  हाल के दिनों में उनकी प्रकाशित किताब 'साथ रखना है' ने हिंदी गजल-आलोचकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।  उनके शेर देखिए—

'उसकी आंखों में चांद रोशन है
तीरगी अब बिखर गई होगी'

'आसमां को भी धरा मिल जाएगी
बस जरा सा सिर झुकाना चाहिए'

बिहार के ग़ज़लकारों पर चर्चा करते हुए हमारा ध्यान कुछ ऐसे शायरों पर भी जाता है. जिन्होंने अपने समय में उम्दा ग़ज़लों की रचना की।  उसमें से कुछ अब नहीं है और कुछ पाबंदी से अभी भी लिख रहे हैं। ऐसे शायरों में शिव नारायण,फजलुर रहमान हाशमी,सियाराम प्रहरी, शिवनंदन सिंह, अशांत भोला, चाँद मुंगेरी, नचिकेता, प्रेमकिरण, छंदराज, अशोक आलोक आदि के नाम लिए जा सकते हैं। बिहार के नए लेकिन स्थापित हो चुके ग़ज़लकारों में जिन से बहुत सारी उम्मीदें वाबस्ता हैं और जो लगातार ग़ज़ल लेखन में सक्रिय हैं उनमें विकास, अभिषेक कुमार सिंह, राहुल शिवाय, अविनाश भारती, श्वेता गजल, रामा मौसम, शेखर सावंत आदि के नाम क़ाबिले ज़िक्र हैं। 

बेगूसराय के अशांत भोला की ग़ज़लों में ठोस यथार्थ हमेशा दिखलाई देता है। समाज में जो कुछ उपेक्षित है उनके अशआर के विषयवस्तु बने हैं.एक-दो शेर मुलाहिजा हो—

'हार कर इंसाफ घर से लौट आए
यातनाओं के सफ़र से लौट आए'

'चुपके से आजमाना अच्छा नहीं लगा
ये आप का निशाना अच्छा नहीं लगा'

आभा पूर्व बिहार के भागलपुर की शायरा हैं।  जिन्होंने नया हस्ताक्षर का संपादन भी किया है।  उन्होंने दोहा ग़ज़ल लिखकर ग़ज़ल की परंपरा को बढ़ाने का काम किया है। उनका यह शेर काफी चर्चित है—

'सांसो पर पहरा हुआ घुटते जाते प्राण
सन्नाटे में चीख़ कर मिला उन्हें वरदान' 

गजल आलोचक अनिरुद्ध सिन्हा ने ग़ज़ल के बारे में लिखा है कि आज की ग़ज़लें जीवन के कुछ बेहद जरूरी बिंदुओं पर चोट करती हैं। सूबे बिहार में लिखी जाने वाली गजलें इस दृष्टि से भी देखी जा सकती हैं। कुछ अशआर ग़ौरतलब हैं—

एक सीधे आदमी को क्यों तबाही दे गई
हाथ में गीता लिए झूठी गवाही दे गई
- उपेंद्र प्रसाद सिंह

आज के दौर की नई गजलें
तिलमिलाती ये किरचई ग़ज़लें
- चांद मुंगेरी

कहीं जुल्म की बादशाही न देना
सितमगर की वह वाहवाही न देना
- दिनेश तपन

जब जान आ के जिस्म से बाहर निकल गई
बेटे ने मकबरा तब बनवाया शान से
- वसंत

ज़लज़लों के बाद भी उम्मीद है
इस यकीं को एक पौधा रह गया
- शांति यादव

उस कलम की कभी न कल आए
जिस कलम पर नहीं ग़ज़ल आए
- सियाराम प्रहरी

इस प्रकार हम देखते हैं कि बिहार के ग़ज़ल लेखन में मानव के अस्तित्व की महत्ता स्वीकार की गई है। हिंदी ग़ज़ल का तेवर शुरू से ही विरोधी विद्रोही और बगावती रहा है। उर्दू की तरह यह आशिकों की शायरी नहीं रही। हिंदी ग़ज़ल अपनी बुनावट तो उर्दू से लेती है लेकिन बनावट इसकी खालिस अपनी है. इसने मोहब्बत की जगह ऊब, फिक्र और उदासी को अपना सब्जेक्ट बनाया है. बल्कि इस परंपरा को बिहार की युवा गजल कार भी अपनी उर्जा दे रहे हैं— बिहार के युवा ग़ज़लकारों में विकास और राहुल शिवाय का नाम काफी अहम है। विकास के दो गजल संग्रह और एक सम्पादित किताब को आलोचकों ने नोटिस किया है। अगर हम विकास की गजलों की गहराई की तरफ जाएं तो पाएंगे कि उनकी ग़ज़लों में प्रेम उत्साह और और सौंदर्य की धारा साथ-साथ बहती है। एक शेर आप भी देखें—

बगल की सीट पर बैठो तुम्हीं अब
तुम्हारे नाम का चर्चा नहीं है
-विकास

' मौन भी अपराध है' के कवि राहुल शिवाय लेखन और प्रकाशन दोनों क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं।  उनके इस एक शेर से आप उनकी गहराई समझ सकते
हैं—
अंधेरी रात है पर रोशनी सलामत है
गमों के बीच भी यह जिंदगी सलामत है

श्वेता ग़ज़ल भी बिहार के महिला ग़ज़लजारों में अपना स्थान तेजी से बना रही हैं. वह मंचों पर भी बेहद सक्रिय हैं। उनकी रचनाओं का लबो-लहजा उन्हें एक मजी हुए शायरा की पहचान दिलाता है। उनका एक जाना-पहचाना शेर है—
तोड़कर दिल गया एक पल में मेरा
प्यार का ये कोई कायदा तो नहीं

बिहार के युवा ग़ज़लकारों में ऐसा ही एक नाम अविनाश भारती का भी है, जो ग़ज़ल तो लिखते ही हैं—वे बिहार के ग़ज़लकारों पर अपना शोध भी पूरा कर रहे हैं। उनका यह शेर देखने योग्य है—
मयस्सर नहीं जब हमें दाल रोटी
मुनासिब है कितना कमाना हमारा
- अविनाश भारती

बिहार के ऐसे ही युवा ग़ज़लकारों में अंजनी कुमार सुमन, कुमार आर्यन,अमन ग्यावी, नवनीत कृष्ण ए. आर आज़ाद आदि भी पाबंदी से ग़ज़ल कह रहे हैं।

सूबे बिहार के एक महत्वपूर्ण हिंदी गजलकार फजलुर रहमान हाशमी भी हैं। उन्होंने मैथिली साहित्य में भी अपनी विशेष पहचान बनाई है। उन्हें मैथिली में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला, पर गहराई से देखा जाए तो हिंदी ग़ज़ल परंपरा में पौराणिक संदर्भ के प्रयोगकर्ता के तौर पर वह अकेले शायर ठहरते हैं। 'मेरी नींद तुम्हारे सपने' उनका हिंदी गजल संग्रह है, जिसके कुछ शेर देखे जा सकते हैं—

'उनकी किस्मत में कब है वैदेही
जो धनुष को कभी उठा न सके'

'मानो एहसान कर्म का अर्जुन
सांप फन बारहा उठाता है'

बिहार की माटी के अमन ज़खीरवी ने भी 'परिंदों का सफर' नामक गजल संग्रह की रचना की है। अपनी ग़ज़लों के बारे में ख़ुद कहते हैं कि मैंने इस संग्रह में आम-फ़हम शब्दों का ही चयन किया है जो हिंदी पाठकों को सहजता से समझ आ सके। उनका यह शेर देखें—

वक्त ने ऐसे दिन दिखाए हैं
कितना बूढा है हर जवां चेहरा

असल में ग़ज़ल सिर्फ सहजता और सरलता का नाम नहीं है। महज शिल्प के बल पर भी अच्छी ग़ज़लें तामीर नहीं की जा सकती। वजन को अपनी संरचना में रहते हुए मुकम्मल ग़ज़ल के लिए असर करने का गुण भी होना चाहिए। अगर शेर को सिर्फ शब्दों या फिर काफिये और रदीफ़ पर बैठा दें तो वह गजल नहीं हो सकेगी। गजल बहर कैफ जीवन के गहरे अनुभव की मांग करती है। आर. पी शर्मा महर्षि ने ग़ज़ल के छंद पर बहुत काम किया है। उनका कथन है कि ग़ज़ल वह है जो जीवन उपयोगी तथा अपनी धरती और परिवेश से जुड़ी हुई हो। उनके अनुसार ग़ज़ल एक सुकोमल विधा है जो नफासत पसंद है, वह भी इतनी के हाथ लगाते ही मैली हो जाती है। उसे सलीके से तथा स्वच्छता से स्पर्श करना पड़ता है। 

बिहार के एक ऐसे महत्वपूर्ण और स्थापित ग़ज़लकार अभिषेक कुमार सिंह है। जिन्होंने ग़ज़ल की परिपाटी से अलग होकर नए शब्द और नए कथ्य दिए हैं।  उनकी ग़ज़लों ने पारंपरिक ग़ज़लों से हटकर अपनी मौजूदगी दर्ज की है। उनके हर शेर में एक नयापन है। वह एक नई दुनिया को स्पर्श करते हैं। अछूते शब्द, चित्र, व्यंजना, कौशल और बिंब के वो लसानी गज़लकार हैं। 'वीथियों के बीच' उनका हालिया प्रकाशित गजल संग्रह है, जिसके पढ़ते हुए उनकी मौलिकता का पता चलता है—

'आओ उतार लायें ज़मीं पर वो रोशनी
झिलमिल जो कर रही है सितारों के आसपास'

'अजीब घोड़े हैं चाबुक की मार सह कर भी
सलाम करते हैं मालिक को हिनहिनाते हुए'

इन पंक्तियों के लेखक डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री की भी दो ग़ज़ल संग्रह खुले दरीचे की खुशबू, और खुशबू छू कर आई है नाम से प्रकाशित है। खुले दरीचे की खुशबू की भूमिका हिंदी के जाने-माने ग़ज़ल का जहीर कुरैशी ने लिखी है। लेखक की हिंदी गजल की आलोचना की भी एक किताब 'गजल लेखन परंपरा और हिंदी गजल का विकास 'नाम से अनुकृति प्रकाशन बरेली द्वारा छपकर आई है। उनके भी एक-दो शेर का अवलोकन किया जा सकता है—

'नई इक फैक्ट्री तामीर कर लेने की चाहत में
यहां के लोग होरी से किसानी छीन लेते हैं'

'हमारी उम्र तो गुजरी उजाले लाते हुए
चराग़ सोच रहा था मकां जलाते हुए'

बिहार के प्रतिष्ठित गजलकारों में शिवनारायण का नाम भी जाना पहचाना है। आप नई धारा के संपादक भी हैं, और प्रसिद्ध हिंदी गज़लकार भी। लगभग 32 पुस्तकों के लेखक शिवनारायण को हिंदी साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए बिहार सरकार ने नागार्जुन सम्मान से भी नवाजा है। 'झील में चांद' इन का महत्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह है। शहंशाह आलम की मानें तो इस संग्रह में समकालीन समय की विश्वव्यापी समस्याओं का जायजा लिया गया है। इस संग्रह के कुछ शेर देखने योग्य हैं—

'उसी के हाथ होंगे फूल सारे
महक का कारवां जो आ रहा है'

'बहुत हैरान है खामोशियों में
परिंदा फड़फड़ाना चाहता है'

असल में ग़ज़ल अपनी शर्तों पर लिखी जाती है, जैसा कि अहमद रजा ने भी लिखा है इसमें नग्मगी, रवानी और मौसिकी जरूरी है। बिहार की ग़ज़लें इस प्रवृत्ति पर भी खरी उतरती है। बिहार के अन्य उभरते हुए ग़ज़लकारों में आनंद वर्धन, मनीष कुमार सिंह, प्रीति सुमन,रामनाथ शोधार्थी, हरिनारायण सिंह,स्वराक्षी स्वरा, रंजना जायसवाल, दीप नारायण आदि के नाम भी उल्लेखनीय हैं— जो ग़ज़ल को आगे बढ़ाने में निरंतर लगे हुए हैं। 

कहना न होगा कि बिहार में जिस तरह से ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, आने वाले समय में यह विधा और मजबूती से स्थापित होगी, जिसमें बिहार के ग़ज़लकारों को और प्रभावपूर्ण ढंग से रेखांकित किया जा सकेगा।

-डॉ ज़ियाउर रहमान जाफ़री
 स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
 मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज गया, बिहार
 ई-मेल : zeaurrahmanjafri786@gmail.com