अक्सर देखती हूँ बचपन को
कचरे के डिब्बों में
पॉलीथीन की थैलियाँ ढूंढते हुए
तो कभी कबाड़ के ढेर में
अपनी पहचान खोते हुए ।

कभी रेहड़ियों पर तो
कभी ढाबे, पानठेलों पर
और कभी बड़ी कोठिओं में
पेट के इस दर्द को मिटाने
अपने भाग्य को मिटाते हुए ।

स्कूल, खेल, खिलौने, साथी
इनकी किस्मत में ये सब कहाँ
इनके लिए तो बस है यहाँ
हर दम काम और उस पर
ढेरों गालियों का इनाम ।

दो वक्त की रोटी की भूख
छीन लेती है इनसे इनका आज
और इन्हें खुद भी नहीं पता चलता
दारु, गुटका और बीड़ी में
अपना दर्द छुपाते छुपाते
कब रूठ जाता है इनसे
इनका बचपन सदा के लिए ।

और इसी तरह
जाने अनजाने
समय से पहले ही
बना देता हैं इन्हें बड़ा
और गरीब भी ।

- डा. अदिति कैलाश

ई-मेल :  a_upwanshi@yahoo.co.in

[Hindi Poem by Dr Aditi Kailash]

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