पीले फूलों की झाड़ी में
टँगी काठ की मछली
मंडराती मूंदे अपनी आँखें
देखती सपना
आकाश में उड़ते कपासी बादलों में
उमड़ती हैं लहरों की स्मृतियाँ

क्या नहीं देखा मैंने
जिसे सोचा कभी किसी ने
पीले फूलों को देख,
क्या उसने मुझे भी देखा
उन टहनियों के बीच
पीले फूलों की झाड़ी में

- मोहन राणा

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