रुख से उनके हमें पर्दा करना ना आया
बेदर्द हम के अदा पे उनके हमें मरना ना आया

बेबफ़ा हो जायेगी एक दिन ये ज़िन्दगी
हमें उसपर शक करना ना आया

कितनी मदहोश अदाएं थी उनकी मगर
हमें उनकी अदाओं पे आहें भरना ना आया

चश्म-ए-अश्क़ को देखा तो था मगर
उसका सूरत-ए-हाल पढ़ना ना आया

बहुत मुमकिन था उनसे अपने दिल की बात कहते
मगर लरज़ते ज़ुबान को मेरे कहना ना आया

- सुभाष श्याम सहर्ष, बी. एच. यू. वाराणसी
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