गए साल कीठिठकी ठिठकी ठिठुरननए साल केनए सूर्य ने तोड़ी।
देश-काल पर,धूप-चढ़ गई,हवा गरम हो फैली,पौरुष के पेड़ों के पत्तेचेतन चमके।
दर्पण-देहीदसों दिशाएँरंग-रूप कीदुनिया बिम्बित करतीं,मानव-मन मेंज्योति-तरंगे उठतीं।
- केदारनाथ अग्रवाल