न तन देखता हूँ , न मन देखता हूँ
उजड़ा चमन सा वतन देखता हूँ।

दिखते नहीं जहाँ में; कुछ करने वाले ,
बहुतों को कहते कथन देखता हूँ
ईमान यहाँ पर पुरस्कृत न होता,
उनका तो सिर्फ दमन देखता हूँ
न तन देखता हूँ,न मन देखता हूँ
उजड़ा चमन सा वतन देखता हूँ।


मक्कारों और नक्कालों को बढ़ते देखा है,
पर सत्य के सिपाही का सिर्फ पतन देखता हूँ,
हिंसा की आग को जलते देखा है,
मानवता की अनल का सिर्फ़ शमन देखता हूँ।
न तन देखता हूँ,न मन देखता हूँ
उजड़ा चमन सा वतन देखता हूँ।


सोचा था जिनको देश का सिपाही,
उनको भी खुद में मगन देखता हूँ,
समझा सकूँ न मैं इस अधीर मन को
अब तो बस ये सूना गगन देखता हूँ,
न तन देखता हूँ,न मन देखता हूँ,
उजड़ा चमन सा वतन देखता हूँ।।

- उत्कर्ष त्रिपाठी