चलो बहुत हुआ अँधेरा सबेर देखते है
जितनी भी है ख़ुशी उसमें कुबेर देखते है।
निराशा की धार में तिनका लूटते है
सहारा मिला तो कुछ मन का ढूंढते है।

किससे कहोगे की क्या थी कमी
कितनी है रेत और कितनी नमी।
बहुत हुआ पतझड़ अब सावन देखते है
मन की ही गंगा में नहावन देखते है।

नीचे भी देखो बराबर में तो कम है
तुमसे भी ज्यादा आज बहुतों में गम है।
प्रकृति की असमानता का नज़ारा देखते है
खड़े इस किनारे पे वो किनारा देखते है।

सपना तो देखा जग के भी सो के भी
पर पौधा ऊगा न क्यों धैर्य का बीज बो के भी।
मेहनत के आईने में किस्मत आज देखते है
खुद की ज़िन्दगी में जनमत आज देखते है।

चार पल की ज़िन्दगी में हर पल मैं हँसूंगा
गज़ब मैं करूँगा और मदद में फँसूंगा ।
जिसने बनाई दुनिया उसकी माया देखते हैं
धूप कितनी भी हो पर छाया आज देखते हैं।

चलो बहुत हुआ अँधेरा सबेर देखते है
जितनी भी है ख़ुशी उसमें कुबेर देखते है।

- दिव्यदीप सिंह


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अविरल भी रहे निर्मल भी रहे,
बहती तू रहे कल कल भी रहे |
ममता से भरी हे देवपरी,
शीतल कर दे कशी नगरी |
पर्वत भी हरे धरती भी हरी,
भक्तों के लिए ठहरी ठहरी |
अमृत तू लिए बहती ही रहे,
धरती की तपन घटती ही रहे|
रविपुंज सहित ऊपर जा के,
बदल से वर्षा करती रहे|
अविरल भी रहे निर्मल भी रहे,
बहती तू रहे कल कल भी रहे |
हे भीष्म जना दृठता की मूरत,
एक बूँद से खिलती सोई सूरत |
पर्वत से घिरी दीपों से भरी,
निर्मल कर दे उत्तर नगरी |
जीवन भी तेरी गोदी में मिले,
राख भी मेरी तुझमें बहे|
अविरल भी रहे निर्मल भी रहे,
बहती तू रहे कल कल भी रहे |

- दिव्यदीप सिंह
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