हम उनकी गली से गुजरे,
उन्होंने हमें देखा, वो मुस्कुराने लगे|
फिर क्या था!
हम रोज उसी गली से जाने लगे,
उनके घर के आगे पीछे मंडराने लगे|
उनके किस्से,
दोस्तों को बढ़ा-चढ़ा कर सुनाने लगे|

इक बहाने से हमने पूछा इक पता, वो समझाने लगे|
हम समझते हुए भी
नासमझी दिखाने लगे|
ऐसा करते-करते
हम दूर रहते हुए भी पास आने लगे|
उनको देख कर कलियाँ खिलती,
उनके बिना फूल भी मुरझाने लगे|

हो गया इश्क
मज़े ख़ूब आने लगे|

हम उनकी गली से फिर गुजरे,
उन्होंनें हमें देखा तो फूल बरसाने लगे|
पर जब उनकी माँ ने हमें देखा, तो गमले भी साथ में आने लगे|

- कुँवर राज "कविराज"

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