बड़ा और छोटा | बोधकथा

रचनाकार: कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर' | Kanhaiyalal Mishra 'Prabhakar'

विशाल वटवृक्ष ने अपनी छाया में इधर-उधर फैले, कुछ छोटे वृक्षों से अभिमान के साथ कहा--"मैं कितना विराट् हूँ और तुम कितने क्षुद्र! मैं अपनी शीतल छाया में सदा तुम्हें आश्रय देता हूँ।"

छोटे वृक्षों ने कहा-- "हाँ, हम क्षुद्र हैं, और तुम विराट हो; पर जानते हो, तुम्हारी यह विराटता हमारा रक्तशोषण करके ही फली फूली है!"
विराट वट ने एक हुंकार भरी।

छोटे वृक्षों ने एक निश्वास छोड़ा।

- कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'