मैं उनकी याद को दिल से कभी भुला न सका,
लगी वो आग जिसे आज तक बुझा न सका।
हँसो-हँसो मेरी दीवानगी पे खूब हँसो,
कि खुद भी खोया गया और उन्हें भी पार न सका।
वो जा रहे थे कहीं दूर जब जुदा होकर,
हज़ार चहा बुलाना मगर बुला न सका।
लिहाज़-ए-शर्म ओ हया और खौफ़-ए-बदनामी,
वो पूछ कुछ न सके और मैं बता न सका।
कभी जो आँख-मिचौली का खेल खेला था,
वो खेल-खेल में ऐसे छुपे कि पा न सका।
हज़ार जतन किए और लाख कोशिश की,
चिराग-ए-इश्क को आँखों से मैं बुझा न सका।
भरे पड़े थे मेरे दिल में सैकड़ों शिकवे,
नज़र मिली तो मैं कुछ भी जुबां पे ला न सका।
न दीन और न दुनिया रही मोहब्बत में,
खुदा को भूल के भी मैं सनम को पा न सका।
बचा है ‘हंस’ ये अरमान ज़िंदगानी में,
कि ‘कैस’ बन के भी लैला उसे बना न सका।
-उदयभानु ‘हंस’
(1946)