"यार, ये दो और दो चार वाला मुहावरा अव्यवहारिक नहीं है?"
"भाई, ये मुहावरा नहीं है... सूत्र है गणित का।"
"सूत्र ही सही, लेकिन इस्तेमाल तो मुहावरे की तरह ही होता है।"
"सो तो है।"
"मेरी नज़र से देखो तो एक और एक, दो भी गलत है।"
"तेरी नज़र में ठीक क्या है?"
"बात नज़र की नहीं, व्यवहार की है। देख एक और एक मिलकर तीन हो सकते हैं, चार-पाँच-छह...ग्यारह भी हो सकते हैं।"
"दो भी रह सकते हैं।"
"हाँ, मिलकर न चलें तो मटियामेट भी हो सकते हैं... शून्य बटा सन्नाटा।"
-बलराम अग्रवाल