जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया ।
हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया ।।
मुझ पर कितने संकट आए, आए सब रोकर चले गए ।
युद्धों के बरसाती बादल, मेरे पग धोकर चले गए ।।
कब मेरी नींव रखी किसने, यह तो मुझको भी याद नहीं ।
पूँछू किससे; नाना-नानी, मेरा कोई आबाद नहीं ।।
इतिहास बताएगा कैसे, वह मेरा नन्हा भाई है ।
उसको इन्सानों की भाषा तक, मैंने स्वयं सिखाई है ।।
हाँ, ग्रन्थ महाभारत थोड़ा, बचपन का हाल बताता है ।
मेरे बचपन का इन्द्रप्रस्थ ही, नाम बताया जाता है ।।
कहते हैं मुझे पांडवों ने ही, पहली बार बसाया था ।
और उन्होंने इन्द्रपुरी से सुन्दर मुझे सजाया था ।।
मेरी सुन्दरता के आगे सब, दुनिया पानी भरती थी ।
सुनते हैं देश विदेशो पर, तब भी मैं शासन करती थी ।।
किन्तु महाभारत से जो, हर ओर तबाही आई थी ।
वह शायद मेरे घर में भी, कोई वीरानी लाई थी ।।
बस उससे आगे सदियों तक, मेरा इतिहास नहीं मिलता ।
मैं कितनी बार बसी-उजड़ी, इसका कुछ पता नहीं चलता ।।
ईसा से सात सदी पीछे, फिर बन्द कहानी शुरू हुई ।
आठवीं सदी के आते ही, भरपूर जवानी शुरू हुई ।।
सचमुच तो राजा अनंगपाल ने फिरसे मुझे बसाया था ।
मेरी शोभा के आगे तब, नन्दन-वन भी शरमाया था ।।
मेरे पाँवों को यमुना ने, आंखों से मल-मल धोया था ।
बादल ने मेरे होंठों को आ-आकर स्वयं भिगोया था ।।
- रामावतार त्यागी