केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था,
गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा ।
था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,
दाम्पत्य में वह सौख्य था जो सौख्य था अपवर्ग में ।। ३९ ।।
निज स्वामियों के कार्य में सम भाग जो लेती न वे,
अनुरागपूर्वक योग जो उसमें सदा देती न वे ।
तो फिर कहातीं किस तरह 'अर्द्धांगिनी' सुकुमारियाँ ?
तात्पर्य यह-अनुरूप ही थीं नरवरों के नारियाँ ।। ४० । ।
हारे मनोहत पुत्र को फिर बल जिन्होंने था दिया,
रहते जिन्होंने नववधू के सुत-विरह स्वीकृत किया ।
द्विज-पुत्र-रक्षा-हित जिन्होंने सुत-मरण सोचा नहीं,
विदुला, सुमित्रा और कुन्तो-तुल्य माताएँ रहीं ।। ४१ ।।
बदली न जा, अल्पायु वर भी वर लिया सो वर लिया;
मुनि को सता कर भूल से, जिसने उचित प्रतिफल दिया ।
सेवार्थ जिसने रोगियों के था विराम लिया नहीं,
थीं धन्य सावित्री, सुकन्या और अंशुमती यहीं ।। ४२ ।।
मूँदे रही दोनों नयन आमरण 'गान्धारी जहाँ,
पति-संग 'दमयन्ती' स्वयं बन बन फिरीं मारी जहाँ ।
यों ही जहाँ की नारियों ने धर्म्म का पालन किया,
आश्चरर्य क्या फिर ईश ने जो दिव्य-बल उनको दिया ।। ४३ ।।
अबला जनों का आत्म-बल संसार में था वह नया,
चाहा उन्होंने तो अधिक क्या, रवि-उदय भी रुक गया !
जिस क्षुब्ध मुनि की दृष्टि से जलकर विहग भू पर गिरा,
वह र्भो सती के तेज-सम्मुख रह गया निष्प्रभ निरा ! ।। ४४ ।।
- मैथिलीशरण गुप्त