क्यों नाम पड़ा मेरा 'दिल्ली', यह तो कुछ याद न आता है ।
पर बचपन से ही दिल्ली, कहकर मझे पुकारा जाता है ॥
इसलिए कि शायद भारत भारत जैसे महादेश का दिल हूँ मैं ।
धर्मों की रीति रिवाज़ों की, भाषाओं की महफ़िल हूँ मैं ॥
बारहवीं सदी की याद कभी, जब भी मुझको आ जाती है ।
मीठी सी एक चुभन बनकर, सपना जैसा छा जाती है ॥
वह समय कि जब चौहानों के, यश वैभव का कुछ अंत न था ।
वह राजा पृथ्वीराज प्रतापी, साधारण सामन्त न था ॥
भारत की धरती पर तब उस जैसा था कोई धीर नहीं ।
उस जैसा कोई शब्द-भेदने, वाला देखा वीर नहीं ॥
हर ओर उसी का हल्ला था, घर-घर उसकी चर्चाएँ थीं ।
महलों में या चौपालों में, उसकी ही सिर्फ कथाएँ थीं ॥
संयुक्ता जैसी रुपवती, उसकी मनचाही रानी थी ।
जिसकी सुन्दरता देख स्वयं, सुन्दरता को हैरानी थी ॥
कवि चन्द्र कि जिसकी कविता से, सारा ही देश महकता था ।
जिसके शब्दों में बिजली थी, स्वर में अंगार दहकता था ॥
वह आदि महाकवि हिन्दी का, वह वीर शिरोमणि बलिदानी ।
वह पृथ्वीराज का मित्र, राजकवि; मेरो आँखों का पानी ।।
उसने 'रासो' को रच करके, मेरा सम्मान बढ़ाया था ।
उसने वीरों को साहस का, गौरव का; पाठ पढ़ाया था ।।
वह राजा पूथ्वीराज नहीं, मेरी आँखों का तारा था ।
हाँ; सोलह बार मुहम्मद गौरी, उसके हाथों हारा था ।।
मेरी रक्षा की थी, मेरे ही; बेटों की तलवारों ने ।
मेरी लाज रखी थी मेरे, अपने राजकुमारों ने ।।
सोलह बार मुहम्मद गौरी, पीठ दिखाकर भागा था ।
लेकिन मेरी किस्मत में तो, शायद अंधियारा जागा था ।।
दुर्दिन के आते ही भाई-भाई में ऐसी फूट पड़ी ।
बदनाम गुलामी की बिजली, मेरे आँगन में टूट पड़ी ।।
गौरी की सेना के आगे, मेरा राजा भी हार गया ।
किस्मत का तारा डूब गया, मेरा सारा श्रृंगार गया ।।
मरघट का हाहाकार मुझे, हर ओर सुनाई देता था ।
मेरी गलियों में देता था, बस खून दिखाई देता था ।।
- रामावतार त्यागी