सात सागर पार करके भी ठिकाना न मिला
सौ साल प्यार करके भी निभाना न मिला
कई जनमों से तो बिछड़े थे एक मां से हम
दूसरी मां के आंचल में भी सिर छिपाना न मिला
पीढ़ियां खेली हैं ऐ देश तेरी गोद में
फिर भी तेरी ममता का हमें नजराना न मिला
हम ने बंजर धरती में खिला दिए रंगीन फूल
तेरी पूजा के लिये दो फूल चढ़ाना न मिला
खून पसीने से बनाया था जन्नत का चमन
इस की किसी डाल पर भी आशियाना न मिला
हम तो पागल हो गये मंजिलों की खोज में
इतनी भटकन के बाद भी कोई ठिकाना न मिला
हम ने क्या पाप किया समझ में आता नहीं
वर्षों की लगन का हमें, कोई इवज़ाना न मिला
- जोगिन्द्र सिंह कंवल, फीज़ी
सनद रहे: जोगिन्द्र सिंह कंवल फीज़ी के प्रतिष्ठित कवि हैं। उनकी यह कविता प्रवासी भारतीयों की व्यथा-कथा है। फीज़ी ने चार तख्ता पलट झेले है जिसमें भारतवंशियों को बहुत हानि उठानी पड़ी। अपनी मातृ-भूमि से बिछुड़ना और नयी धरती पर जड़े न जम पायें तो कलम का ऐसा क्रंदन स्वाभाविक है। - संपादक