ज़ंजीरों से चले बाँधनेआज़ादी की चाह।घी से आग बुझाने कीसोची है सीधी राह!
हाथ-पाँव जकड़ो,जो चाहोहै अधिकार तुम्हारा।ज़ंजीरों से क़ैद नहींहो सकता ह्रदय हमारा!
-सोहनलाल द्विवेदी