ख़ुशामद | लघुकथा

रचनाकार: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

एक नामुराद आशिक से किसी ने पूछा, 'कहो जी, तुम्हारी माशूक़ा तुम्हें क्यों नहीं मिली।'

बेचारा उदास होकर बोला, 'यार कुछ न पूछो! मैंने इतनी ख़ुशामद की कि उसने अपने को सचमुच ही परी समझ लिया और हम आदमियों से बोलने में भी परहेज़ किया।'

-भारतेंदु हरिश्चंद्र