ये घर है दर्द का घर, परदे हटा के देखो,ग़म हैं हँसी के अंदर, परदे हटा के देखो।
लहरों के झाग ही तो, परदे बने हुए हैं,गहरा बहुत समंदर, परदे हटा के देखो।
चिड़ियों का चहचहाना, पत्तों का सरसराना,सुनने की चीज़ हैं पर, परदे हटा के देखो।
नभ में उषा की रंगत, सूरज का मुस्कुरानाये ख़ुशगवार मंज़र, परदे हटा...
अचानक तुम्हारे पीछे कोई कुत्ता भोंके, तो क्या तुम रह सकते हो बिना चोंके?
अगर रह सकते हो तो या तो तुम बहरे हो,या फिर बहुत गहरे हो!
- अशोक चक्रधर[सोची-समझी, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली]
लहर ने समंदर सेउसकी उम्र पूछी,समंदर मुस्करा दिया।
लेकिन जब बूँद नेलहर से उसकी उम्र पूछीतो लहर बिगड़ गईकुढ़ गई चिढ़ गईबूँद के ऊपर ही चढ़ गई...और. . .इस तरह मर गई!
बूँद समंदर में समा गईऔर. . .समंदर की उम्र बढ़ा गई!
- अशोक चक्रधर[सोची-समझी, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली]
तुम भी जल थेहम भी जल थेइतने घुले-मिले थे किएक-दूसरे से जलते न थे।न तुम खल थेन हम खल थेइतने खुले-खिले थे किएक-दूसरे को खलते न थे।अचानक तुम हमसे जलने लगेतो हम तुम्हें खलने लगे।तुम जल से भाप हो गए,और 'तुम' से 'आप' हो गए।
- अशोक चक्रधर [ निकष परिचय से ]
क्या होता है कार मेंपास की चीज़ेंपीछे दौड़ जाती हैंतेज़ रफ़्तार में!
और यह शायदगति का ही कुसूर है,कि वही चीजदेर तकसाथ रहती हैजो जितनी दूर है ।
-अशोक चक्रधर
[सोची-समझी, प्रतिभा प्रतिष्ठान, नई दिल्ली]
एक डॉक्टर मित्र हमारेस्वर्ग सिधार।कोरोना से मर गए,सांत्वना देनेहम उनके घर गए।
उनकी नन्ही-सी बिटिया भोली-नादान थी जीवन-मृत्यु से अनजान थी।
हमेशा की तरहद्वार पर आई,देखकर मुस्कुराई।उसकी नन्ही सच्चाईदिल को लगी बेधने,बोली-- अंकल!भगवान जी बीमार हैं नपापा गए हैं देखने।
- अशोक चक्रधर