सुदर्शन | Sudershan साहित्य | Collections

Author's Selected Works & Collections

कुल रचनाएँ: 7

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मेरी बड़ाई | लघुकथा

जिस दिन मैंने मोटरकार ख़रीदी, और उसमें बैठकर बाज़ार से गुज़रा, उस दिन मुझे ख्याल आया, "यह पैदल चलने वाले लोग बेहद छोटे हैं, और मैं बहुत बड़ा हूँ।"
और जब शाम को मैं और मेरी बड़ाई घर आए, तो हम दोनों खुश थे, और हमारे चेहरे सीढ़ियों के अँधेरे में चमकते थे।
और जब हम सोफ़े पर बैठ गए, तो मेरी छोटी बच्...

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संसार की सबसे बड़ी कहानी

पृथ्वी के प्रारम्भ में जब परमात्मा ने हमारी नयनाभिराम सृष्टि रची, तो आदमी को चार हाथ दिये, चार पाँव दिये, दो सिर दिये और एक दिल दिया । और कहा-"तू कभी दुःखी न होगा । तेरा संसार स्वर्ग है।"
उस समय आदमी बलवान, सूरमा, शान्त, प्रसन्न-हृदय और प्रफुल्ल-वदन था। प्रकृति की समझ में न आनेवाली सारी शक्तियाँ...

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भारी नहीं, भाई है | लघुकथा

मैंने कांगड़े की घाटी में एक लड़की को देखा, जो चार साल की थी, और दुबली-पतली थी। और एक लड़के को देखा, जो पांच साल का था, और मोटा ताज़ा था। यह लड़की उस लड़के को उठाए हुए थी, और चल रही थी।
लडकी के पांव धीरे धीरे उठते थे, और उसका रास्ता लम्बा था, और उसके माथे पर पसीने के मोती चमकते थे। वह हांप रही थ...

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हार की जीत | कहानी

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे 'सुल्तान' कह कर पुकारते, अपने हाथ से ...

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कवि का चुनाव

[ 1 ]
चांद और सूरज के प्रिय महाराज ने अपने नौजवान मंत्री से कहा- ''हमें अपने दरबार के लिए एक कवि की ज़रूरत है, जो सचमुच कवि हो।"
दूसरे दिन नौजवान मंत्री ने नगर में मुनादी करा दी। तीसरे दिन एक हज़ार एक आदमी मंत्री के महल के नीचे खड़े थे, और कहते थे, हम सब कवि है। मंत्री ने इक्कीस दिनों में उन सबक...

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नारी के उद्गार

'माँ' जब मुझको कहा पुरुष ने, तु्च्छ हो गये देव सभी।इतना आदर, इतनी महिमा, इतनी श्रद्धा कहाँ कमी?उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार। देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि:! विजयी मेरा शाश्वत प्यार॥
'बहिन!' पुरुष ने मुझे पुकारा, कितनी ममता! कितना नेह!'मेरा भैया' पुलकित अन्तर, एक प्राण हम, ...

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मन की आँखें खोल

बाबा, मन की आँखें खोल! दुनिया क्या है खेल-तमाशा, चार दिनों की झूठी आशा, पल में तोला, पल में माशा, ज्ञान-तराजू लेके हाथ में--- तोल सके तो तोल। बाबा, मनकी आँखें खोल! झूठे हैं सब दुनियावाले, तन के उजले मनके काले, इनसे अपना आप बचा ले, रीत कहाँ की प्रीत कहाँ की--- कैसा प्रेम-किलोल। बाबा, मनकी आँखें खो...

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सुदर्शन | Sudershan का जीवन परिचय