गोपालदास ‘नीरज’ साहित्य | Collections

Author's Selected Works & Collections

कुल रचनाएँ: 13

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बदन पे जिसके... 

बदन पे जिसके शराफत का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा 
खरीदने को जिसे कम थी दौलते दुनिया किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा 
मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख्मी कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा 
बड़ा न छोटा कोई, फर्क बस नज़र का है सभी पे चलते सम...

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गोपालदास नीरज के गीत | जलाओ दीये | Neeraj Ke Geet

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतनाअँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ।
नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,निशा की गली में तिमिर राह भूले,खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतनाअँधेरा धरा पर कहीं रह न ...

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अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत

अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाएजिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए
आग बहती है यहाँ, गंगा में, झेलम में भीकोई बतलाए, कहाँ जाकर नहाया जाए
मेरा मकसद है के महफिल रहे रोशन यूँहीखून चाहे मेरा, दीपों में जलाया जाए
मेरे दुख-दर्द का, तुझपर हो असर कुछ ऐसामैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए
जिस्म दो होक...

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जितना कम सामान रहेगा | नीरज का गीत

जितना कम सामान रहेगाउतना सफ़र आसान रहेगा
जितनी भारी गठरी होगीउतना तू हैरान रहेगा
उससे मिलना नामुमक़िन हैजब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा
हाथ मिलें और दिल न मिलेंऐसे में नुक़सान रहेगा
जब तक मन्दिर और मस्जिद हैंमुश्क़िल में इन्सान रहेगा
‘नीरज' तो कल यहाँ न होगाउसका गीत-विधान रहेगा
- नीरज

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तुम दीवाली बनकर

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊँगा!
सूनी है मांग निशा की चंदा उगा नहींहर द्वार पड़ा खामोश सवेरा रूठ गया,है गगन विकल, आ गया सितारों का पतझरतम ऐसा है कि उजाले का दिल टूट गया,तुम जाओ घर-घर दीपक बनकर मुस्काओमैं भाल-भाल पर कुंकुम बन लग जाऊँगा!
तुम दीवाली बनकर जग का त...

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गोपालदास नीरज के दोहे

(1)कवियों की और चोर की गति है एक समानदिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान
(2)दोहा वर है और है कविता वधू कुलीनजब इसकी भाँवर पड़ी जन्मे अर्थ नवीन
(3)जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूलजूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल
(4)भूखा पेट न जानता क्या है धर्म-अधर्मबेच देय संतान तक, भूख न जाने शर्म
(5)दूरभ...

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धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा,धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !
बहुत बार आई-गई यह दिवालीमगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है,बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तककफन रात का हर चमन पर पड़ा है,न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटेऊषा को जगाओ, निशा को सुलाओ !दिए से मिटेगा न मन का अँधेराधरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !
सृजन श...

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मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा

मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा!
रोज रात को नींद चुरा ले जायेगी पपिहों की टोली,रोज प्रात को पीर जगाने आयेगी कोयल की बोली,रोज दुपहरी में तुमसे कुछ कथा कहेंगी सूनी गलियाँ,रोज साँझ को आँख भिगो जायेंगी कुछ मुरझाई कलियाँ,यह सब होगा, पर न दुःखी तुम होना मेरी मुक्त-केशिनी !
तुम सिसकोगी व...

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खिड़की बन्द कर दो

खिड़की बन्द कर दोअब सही जाती नहीं यह निर्दयी बरसात-खिड़की बन्द कर दो।
यह खड़ी बौछार, यह ठंडी हवाओं के झकोरे,बादलों के हाथ में यह बिजलियों के हाथ गोरेकह न दें फिर प्राण से कोई पुरानी बात - खिड़की बन्द कर दो।
वो अकेलापन कि अपनी साँस लगती फाँस जैसी,काँपती पीली शिखा दिखती दिये की लाश जैसी,जान पड़ता...

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अब के सावन में

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुईमेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई
आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुजरीथा लुटेरों का जहाँ गाँव, वहाँ रात हुई
ज़िंदगी-भर तो हुई गुफ़्तगू ग़ैरों से मगरआज तक हमसे हमारी न मुलाक़ात हुई
हर ग़लत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझकोएक आवाज़ तेरी जब से मेरे साथ हुई
मै...

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मुझको याद किया जाएगा

आँसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगाजहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।
मान-पत्र मैं नहीं लिख सकाराजभवन के सम्मानों कामैं तो आशिक रहा जनम सेसुंदरता के दीवानों कालेकिन था मालूम नहीं येकेवल इस गलती के कारणसारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।
खिलने को तैयार नहीं थींतुलसी भी...

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नीरज के हाइकु

जन्म मरण समय की गति के हैं दो चरण
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किसको मिलावफा का दुनिया मेंवफा ही सिला
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वो हैं अकेले दूर खड़े होकर देखें जो मेले
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मेरी जवानी कटे हुये पंखों की एक निशानी
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वो है अपने देखें हो मैंने जैसे झूठे सपने
 
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किससे कहें सब के सब दुख खुद ही सहें
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ओस की बूंद फूल पर सोई जो धूल में मि...

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कोई नहीं पराया

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है।
मैं ना बँधा हूँ देश-काल की जंग लगी जंजीर में,मैं ना खड़ा हूँ जाति-पाति की ऊँची-नीची भीड़ में,मेरा धर्म ना कुछ स्याही-शब्दों का सिर्फ गुलाम है,मैं बस कहता हूँ कि प्यार है तो घट-घट में राम है,मुझ से तुम ना कहो कि मंदिर-मस्जिद पर मैं सर टेक दूँ,
मेरा तो आराध्य आदम...

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गोपालदास ‘नीरज’ का जीवन परिचय