मैथिलीशरण गुप्त यद्यपि बालसाहित्य की मुख्यधारा में सम्मिलित नही तथापि उन्होंने कई बाल-कविताओं से हिन्दी बाल-काव्य को समृद्ध किया है। उनकी 'माँ, कह एक कहानी' कविता के अतिरिक्त 'सर्कस' व 'ओला' बाल-कविताएँ अत्यंत लोकप्रिय रचनाएं हैं। यहाँ उनकी बाल-कविताओं को संकलित किया गया है।
होकर कौतूहल के बस में,गया एक दिन मैं सरकस में।भय-विस्मय के खेल अनोखे,देखे बहु व्यायाम अनोखे।एक बड़ा-सा बंदर आया,उसने झटपट लैम्प जलाया।डट कुर्सी पर पुस्तक खोली,आ तब तक मैना यौं बोली।"हाजिर है हजूर का घोड़ा,"चौंक उठाया उसने कोड़ा।आया तब तक एक बछेरा,चढ़ बंदर ने उसको फेरा।टट्टू ने भी किया सपाटा,टट्टी...
उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा। मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ? युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से । निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ...
तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं? सब द्वारों पर भीड़ मची है, कैसे भीतर आऊं मैं? द्वारपाल भय दिखलाते हैं, कुछ ही जन जाने पाते हैं, शेष सभी धक्के खाते हैं, क्यों कर घुसने पाऊं मैं? तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं? तेरी विभव कल्पना कर के, उसके वर्णन से मन भर के, भ...
मूर्तिमती जिनकी विभूतियाँजागरूक हैं त्रिभुवन में;मेरे राम छिपे बैठे हैंमेरे छोटे-से मन में;
धन्य-धन्य हम जिनके कारणलिया आप हरि ने अवतार;किन्तु त्रिवार धन्य वे जिनकोदिया एक प्रिय पुत्र उदार;
हुए कुमारी कुन्ती के ज्योंवीर कर्ण दानी मानी;माँ मरियम के ईश हुए त्योंधर्मरूप वर बलिदानी;
अपना ऐसा रक्त ...
"माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?" "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी? माँ कह एक कहानी।" "तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।" "जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"...
यहाँ मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती को संकलित करने का प्रयास आरंभ किया है। विश्वास है पाठकों को रोचक लगेगा।
'भारत-भारती' की प्रस्तावना में स्वयं गुप्तजी लिखते हैं-"यह बात मानी हुई है कि भारत की पूर्व और वर्तमान दशा में बड़ा भारी अन्तर है। अन्तर न कहकर इसे वैपरीत्य कहना चाहिए। एक वह समय था कि यह द...
मंगलाचरण
मानस भवन में आर्य्जन जिसकी उतारें आरतीं-भगवान् ! भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।हो भद्रभावोद्भाविनी वह भारती हे भवगते !सीतापते। सीतापते !! गीतामते! गीतामते !! ।।१।।
उपक्रमणिका
हाँ, लेखनी ! हृत्पत्र पर लिखनी तुझे है यह कथा,दृक्कालिमा में डूबकर तैयार होकर सर्वथा।स्वच्छन्दता से कर तुझे क...
भारतमाता का यह मन्दिर, समता का संवाद यहाँ, सबका शिव-कल्याण यहाँ है, पावें सभी प्रसाद यहाँ। नहीं चाहिये बुद्धि वैरकी, भला प्रेम-उन्माद यहाँ, कोटि-कोटि कण्ठों से मिलकर,उठे एक जयनाद यहाँ । जाति,धर्म या सम्प्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहाँ, सबका स्वागत सबका आदर, सबका सम-सम्मान यहाँ। राम-रहीम, बुद्ध-ईस...
मेरी भाषा में तोते भी राम-राम जब कहते हैं,मेरे रोम-रोम से मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं।सब कुछ छूट जाए, मैं अपनी भाषा; कभी न छोडूँगा।वह मेरी माता है उससे नाता कैसे तोडूंगा।।कभी अकेला भी हूँगा मैं तो भी सोच न लाऊँगा,अपनी भाषा में अपनों के गीत वहां भी गाऊँगा।मुझे एक संगिनी वहाँ भी अनायास मिल जावेगी,म...
भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ?फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ ।सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है ,उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन ? भारत वर्ष है ।।१५।।
हाँ, वृद्ध भारतवर्ष ही संसार का सिरमौर है ,ऐसा पुरातन देश कोई विश्व में क्या और है ?भगवान की भव-भूतियों का यह प...
नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को । संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलम्बन को ...
शुभ शान्तिमय शोभा जहाँ भव-बन्धनों को खोलती,हिल-मिल मृगों से खेल करती सिंहनी थी डोलती!स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ,उन ऋषिगणों से ही हमारा था हुआ उद्भव यहाँ ।। १८ ।।
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भारत-भारती से साभार
एक सफेद बड़ा-सा ओला,था मानो हीरे का गोला!हरी घास पर पड़ा हुआ था,वहीं पास मैं खड़ा हुआ था!मैंने पूछा क्या है भाई,तब उसने यों कथा सुनाई!जो मैं अपना हाल बताऊँ,कहने में भी लज्जा पाऊँ!पर मैं तुझै सुनाऊँगा सब,कुछ भी नहीं छिपाऊँगा अब!जो मेरा इतिहास सुनेंगे,वे उससे कुछ सार चुनेंगे!यद्यपि मैं न अब रहा कही...
उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है ।वे धर्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,उनसे वही गम्भीर थे, वरवीर थे, ध्रुव धीर थे ।। १९।।
उनके अलौकिक दर्शनों से दूर होता पाप था,अति पुण्य मिलता था तथा मिटता हृदय का ताप था ।उपदेश उनके शान्तिकारक थे निवारक शोक ...
आदर्श जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए ? सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए ।हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे ।पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे ।। ३० ।।
गौतम, वशिष्ठ-समान मुनिवर ज्ञान-दायक थे यहाँ,मनु, याज्ञवल्क्य-समान सप्तम विधि-विधायक थे यहाँ ।बाल्मीकि वेदव्यास-से गुण...
केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था,गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा ।था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,दाम्पत्य में वह सौख्य था जो सौख्य था अपवर्ग में ।। ३९ ।।
निज स्वामियों के कार्य में सम भाग जो लेती न वे,अनुरागपूर्वक योग जो उसमें सदा देती न वे ।तो फिर कहातीं...
शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे,निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे ।संसार को पहले हमीं ने ज्ञान-भिक्षा दान की,आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की ।। ४५ ।।
'हाँ' और 'ना' भी अन्य जन करना न जब थे जानते,थे ईश के आदेश तब हम वेदमंत्र बखानते ।जब थे दिगम्बर रूप में वे ज...
करो अपनी भाषा पर प्यार।जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार।।
जिसमें पुत्र पिता कहता है, पत्नी प्राणाधार,और प्रकट करते हो जिसमें तुम निज निखिल विचार।बढ़ाओ बस उसका विस्तार।करो अपनी भाषा पर प्यार।।
भाषा बिना व्यर्थ ही जाता ईश्वरीय भी ज्ञान,सब दानों से बहुत बड़ा है ईश्वर का यह दान।असंख्यक हैं इ...
राम, तुम्हें यह देश न भूले,धाम-धरा-धन जाय भले ही,यह अपना उद्देश न भूले।निज भाषा, निज भाव न भूले,निज भूषा, निज वेश न भूले।प्रभो, तुम्हें भी सिन्धु पार सेसीता का सन्देश न भूले।
-मैथिलीशरण गुप्त [स्वदेश संगीत ]
अस्त हो गया है तप-तप कर प्राची, वह रवि तेरा। विश्व बिलखता है जप-जपकर, कहाँ गया रवि मेरा?
- मैथिलीशरण गुप्त [रबीन्द्रनाथ टैगोर को समर्पित मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ]
(राष्ट्रीय गीत)
जय जय भारत माता!तेरा बाहर भी घर-जैसा रहा प्यार ही पाता॥ऊँचा हिया हिमालय तेरा,उसमें कितना दरद भरा!फिर भी आग दबाकर अपनी,रखता है वह हमें हरा। सौ सौतो से फूट-फूटकर पानी टूटा आता॥जय जय भारत माता !
कमल खिले तेरे पानी में,धरती पर हैं आम फले। उस धानी आँचल में आहा,कितने देश-विदेश पले। ...
जल, रे दीपक, जल तू। जिनके आगे अँधियारा है, उनके लिए उजल तू॥
जोता, बोया, लुना जिन्होंने,श्रम कर ओटा, धुना जिन्होंने,बत्ती बँटकर तुझे संजोया, उनके तप का फल तू। जल, रे दीपक, जल तू॥
अपना तिल-तिल पिरवाया है,तुझे स्नेह देकर पाया है,उच्च स्थान दिया है घर में, रह अविचल झलमल तू। जल, रे दीपक, जल तू॥
चूल...