रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar साहित्य | Collections

Author's Selected Works & Collections

कुल रचनाएँ: 17

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नदियाँ और समुद्र

एक ऋषि थे, जिनका शिष्य तीर्थाटन करके बहुत दिनों के बाद वापस आया।
संध्या-समय हवन-कर्म से निवृत होकर जब गुरु और शिष्य, ज़रा आराम से, धूनी के आर-पार बैठे, तब गुरु ने पूछा, "तो बेटा, इस लंबी यात्रा में तुमने सबसे बड़ी कौन बात देखी? "शिष्य ने कुछ सोचकर कहा, "सबसे बड़ी बात तो मुझे यह लगी कि देश की सार...

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चूहे की दिल्ली-यात्रा

चूहे ने यह कहा कि चुहिया! छाता और घड़ी दो,लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वह पगड़ी दो।मटर-मूँग जो कुछ घर में है, वही सभी मिल खाना,खबरदार, तुम लोग कभी बिल से बाहर मत आना!बिल्ली एक बड़ी पाजी है रहती घात लगाए,जाने वह कब किसे दबोचे, किसको चट कर जाए।सो जाना सब लोग लगाकर दरवाजे में किल्ली,आज़ादी का जश्न ...

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बापू

संसार पूजता जिन्हें तिलक, रोली, फूलों के हारों से, मैं उन्हें पूजता आया हूँ बापू ! अब तक अंगारों से। अंगार, विभूषण यह उनका विद्युत पीकर जो आते हैं, ऊँघती शिखाओं की लौ में चेतना नयी भर जाते हैं। उनका किरीट, जो कुहा-भंग करके प्रचण्ड हुंकारों से, रोशनी छिटकती है जग में जिनके शोणित की धारों से। झ...

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कलम, आज उनकी जय बोल | कविता

जला अस्थियाँ बारी-बारीचिटकाई जिनमें चिंगारी,जो चढ़ गये पुण्यवेदी परलिए बिना गर्दन का मोलकलम, आज उनकी जय बोल।
जो अगणित लघु दीप हमारे,तूफ़ानों में एक किनारे,जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन,मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल।कलम, आज उनकी जय बोल।
पीकर जिनकी लाल शिखाएं,उगल रही सौ लपट दिशाएं,जिनके सिंहनाद से सहमी,धर...

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वीर | कविता

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैंस्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
सच है, विपत्ति जब आती है,कायर को ही दहलाती है,सूरमा नहीं विचलित होते,क्षण एक नहीं धीरज खोते,विघ्नों को गले लगाते हैं,काँटों में राह बनाते हैं।
मुँह से न कभी उफ़ कहते हैं,संकट का चरण न गहते हैं,जो आ पड़ता सब सहते हैं,उद्योग - निरत नित...

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जयप्रकाश

झंझा सोई, तूफान रूका, प्लावन जा रहा कगारों में; जीवित है सबका तेज किन्तु, अब भी तेरे हुंकारों में।

दो दिन पर्वत का मूल हिला, फिर उतर सिन्धु का ज्वार गया, पर, सौंप देश के हाथों में वह एक नई तलवार गया।

’जय हो’ भारत के नये खड्ग; जय तरुण देश के सेनानी! जय नई आग! जय नई ज्योति! जय...

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आशा का दीपक

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है; थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है। चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से; चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से। बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है; थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है। अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का; स...

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कृष्ण की चेतावनी

वर्षों तक वन में घूम-घूम,बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,पांडव आये कुछ और निखर।सौभाग्य न सब दिन सोता है,देखें, आगे क्या होता है।
मैत्री की राह बताने को,सबको सुमार्ग पर लाने को,दुर्योधन को समझाने को,भीषण विध्वंस बचाने को,भगवान् हस्तिनापुर आये,पांडव का संदेशा लाये।
‘दो न्याय ...

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परशुराम की प्रतीक्षा

दो शब्द (प्रथम संस्करण)
इस संग्रह में कुल अठारह कविताएँ, जिनमें से पन्द्रह ऐसी हैं जो पहले किसी भी संग्रह में नहीं निकली थीं। केवल तीन रचनाएँ ‘सामधेनी' से लेकर यहाँ मिला दी गयी हैं। यह इसलिए कि इन कविताओं का असली समय अब आया है।
नेफ़ा-युद्ध के प्रसंग में भगवान् परशुराम का नाम अत्यन्त समीची...

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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 1

गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?
उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;
गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;शीतल करते हैं अनल प्रबु...

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रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;और लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला ज...

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जनतंत्र का जन्म

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,जब अंग-अंग में लगे साँप हो चूस रहे,तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।
जनता? हां,लंबी - बड...

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नये सुभाषित

पत्रकार
जोड़-तोड़ करने के पहले तथ्य समझ लो,पत्रकार, क्या इतना भी तुम नहीं करोगे?
मुक्त देश
मुक्त देश का यह लक्षण है मित्र!कष्ट अल्प, पर, शोर बहुत होता है।तानाशाही का पर, हाल विचित्र,जीभ बाँध जन मन-ही-मन रोता है।
ज्ञानज्ञान अर्जित कर हमें फिर प्राप्त क्या होता?सिर्फ इतनी बात, हम सब मूर्ख हैं।
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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 2

(खण्ड दो)
हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?
यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,जिस पापी को ...

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नेता

नेता ! नेता ! नेता !
क्या चाहिए तुझे रे मूरख !सखा ? बन्धु ? सहचर ? अनुरागी ?या जो तुझको नचा-नचा मारेवह हृदय-विजेता ?नेता ! नेता ! नेता !
मरे हुओं की याद भले कर,किस्मत से फरियाद भले कर,मगर, राम या कृष्ण लौट करफिर न तुझे मिलनेवाले हैं ।टूट चुकी है कडी,एक तू ही उसको पहने बैठा है ।पूजा के ये फूल फे...

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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 3

(खण्ड तीन)
किरिचों पर कोई नया स्वप्न ढोते हो ?किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो ?
दुर्दान्त दस्यु को सेल हूलते हैं हम;यम की दंष्ट्रा से खेल झूलते हैं हम।वैसे तो कोई बात नहीं कहने को,हम टूट रहे केवल स्वतंत्र रहने को।
सामने देश माता का भव्य चरण है,जिह्वा पर जलता हुआ एक, बस प्रण है,काटेंगे अरि का ...

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लोहे के पेड़ हरे होंगे

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चीत्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,कंकालों के हों ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन, लेना ही होगा,जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।रंगों के स...

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रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar का जीवन परिचय