गयाप्रसाद शुक्ल सनेही | Profile & Collections

'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।'

उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' का जन्म श्रावण शुक्ल 13, संवत्‌ 1940 वि. तदनुसार 21 अगस्त, 1883 को हड़हा ग्राम, उन्नाव में हुआ था। आपके पिता का नाम पं० अवसेरीलाल शुक्ल व माता का नाम श्रीमती रुक्मिणी देवी था। आप जब केवल पाँच वर्ष के बालक थे कि आपके पिता का साया आपके सिर से उठ गया।

1899 में सनेहीजी अपने गांव से आठ मील दूर बरहर नामक गांव के प्राइमरी स्कूल के अध्यापक नियुक्त हुए। 1921 में टाउन स्कूल की हेडमास्टरी से त्यागपत्र दे दिया और शिक्षण-कार्य की सरकारी नौकरी से मुक्ति पा ली। यह गांधीजी के आंदोलन का प्रभाव था जिससे प्रेरित और प्रभावित होकर सनेहीजी ने त्यागपत्र दिया था। इसी वर्ष उपन्यास सम्राठ प्रेमचंद ने भी त्यागपत्र दे दिया था।

आरंभ में सनेहीजी ब्रजभाषा में ही लिखते थे और रीति-परंपरा का अनुकरण करते थे। उस ज़माने की प्रसिद्ध काव्य-पत्रिकाओं में सनेहीजी की रचनाएं रसिक-रहस्य, साहित्य-सरोवर, रसिक-मित्र इत्यादि में छपने लगी थीं।

सनेहीजी द्वारा रचित प्रमुख कृतियां हैं - प्रेमपचीसी, गप्पाष्टक, कुसुमांजलि, कृषक-क्रन्दन, त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मंत्र, संजीवनी, राष्ट्रीय वीणा (द्वितीय भाग), कलामे-त्रिशूल, करुणा-कादम्बिनी और सनेही रचनावली।

सनेहीजी का 20 मई 1972 को निधन होगया।