अज्ञेय साहित्य | Collections

Author's Selected Works & Collections

कुल रचनाएँ: 11

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कलगी बाजरे की

हरी बिछली घास।दोलती कलगी छरहरी बाजरे की।अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिकाअब नहीं कहता,या शरद् के भोर की नीहार न्हायी कुँई।टटकी कली चंपे की, वगैरह, तोनहीं, कारण कि मेरा हृदय उथला या सूना हैया कि मेरा प्यार मैला हैबल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गए हैं।देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं ...

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शत्रु

ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, ‘‘ज्ञान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है। उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो।''
ज्ञान जाग पड़ा। उसने देखा, संसार अन्धकार में पड़ा है। और मानव-जाति उस अन्धकार में पथ-भ्रष्ट होकर विनाश की ओर बढ़ती चली जा र...

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मेरे देश की आँखें

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैंपुते गालों के ऊपरनकली भवों के नीचेछाया प्यार के छलावे बिछातीमुकुर से उठाई हुईमुस्कान मुस्कुरातीये आँखें -नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं... तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार सेशरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ -नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं... वन डालि...

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साँप!

साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहींनगर में बसनाभी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे?)तब कैसे सीखा डँसना-
विष कहाँ पाया?
- अज्ञेय
 

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जो पुल बनाएँगें

जो पुल बनाएँगेंवे अनिवार्यत:पीछे रह जाएँगेसेनाएँ हो जाएगी पारमारे जाएँगे रावणजयी होंगें राम ,जो निर्माता रहेइतिहास मेंबंदर कहलाएँगे
- अज्ञेय

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मेजर चौधरी की वापसी

किसी की टाँग टूट जाती है, तो साधारणतया उसे बधाई का पात्र नहीं माना जाता। लेकिन मेजर चौधरी जब छह सप्ताह अस्पताल में काटकर बैसाखियों के सहारे लडख़ड़ाते हुए बाहर निकले, तो बाहर निकलकर उन्होंने मिज़ाजपुर्सी के लिए आए अफसरों को बताया कि उनकी चार सप्ताह की 'वारलीव' के साथ उन्हें छह सप्ताह की 'कम्पैशनेट...

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योगफल

सुख मिला :उसे हम कह न सके।दुख हुआ :उसे हम सह न सके।संस्पर्श बृहत् का उतरा सुरसरि-सा :हम बह न सके ।यों बीत गया सब : हम मरे नहीं, पर हाय कदाचित्जीवित भी हम रह न सके।
- अज्ञेय

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कोठरी की बात

मुझ पर किसी ने कभी दया नहीं की, किन्तु मैं बहुतों पर दया करती आयी हूँ। मेरे लिए कभी कोई नहीं रोया, किन्तु मैंने कितनों के लिए आँसू बहाये हैं, ठंडे, कठोर, पत्थर के आँसू...
किन्तु इसके विपरीत, कितने ही भावुक व्यक्तियों ने मेरे विषय में काव्य रचे हैं, कितने ही मेरे ध्यान में तन्मय हो गये हैं, पर मै...

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लक्षण

आँसू से भरने पर आँखें और चमकने लगती हैं।सुरभित हो उठता समीर जब कलियाँ झरने लगती हैं।
बढ़ जाता है सीमाओं से जब तेरा यह मादक हास,समझ तुरत जाता हूँ मैं--'अब आया समय बिदा का पास।'
-अज्ञेय
 

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यह दीप अकेला

यह दीप अकेला स्नेह भराहै गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह जन है-- गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा?पनडुब्बा-- ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लाएगा?
यह समिधा-- ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा।यह अद्वितीय-- यह मेरा-- यह मैं स्वयं विसर्जित--यह दीप, अकेला, स्नेह भराहै गर्व भरा मदमाता, पर इस...

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सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचा कर भागे,तुम, जो बहिनें छोड़ बिलखती बढ़े जा रहे आगे!रुक कर उत्तर दो, मेरा है अप्रतिहत आह्वान--सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो बड़े-बड़े गद्दों पर ऊँची दूकानों में,उन्हें कोसते हो जो भूखे मरते ...

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अज्ञेय का जीवन परिचय