छ्प्पै
पड़ने लगती है पियूष की शिर पर धारा।हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा।बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती।कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती।
आते ही मुख पर अति सुखद,जिसका पावन नामही।इक्कीस कोटि जन पूजिता,हिन्दी भाषा है वही ।। 1 ।।
जिसने जग में जन्म दिया और पोसा, पाला।जिसने यक यक लहु...
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
ज्यों निकल कर बादलों की गोद सेथी अभी इक बूँद कुछ आगे बढ़ी,सोचने फिर-फिर यही जी में लगीआह क्यों घर छोड़ कर मैं यूँ कढ़ी।
दैव मेरे भाग्य में है क्या बदामैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?या जलूँगी गिर अंगारे पर किसीचू पड़ूँगी या कमल के फूल में ?
बह गई उस काल कुछ ऐसी हव...
खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो ।पर अति सुरंग लाल चादर को मत बदरंग बनाओ ।न अपना रग गँवाओ ।
जनम-भूमि की रज को लेकर सिर पर ललक चढ़ाओ ।पर अपने ऊँचे भावो को मिट्टी में न मिलाओ ।न अपनी धूल उड़ाओ ।
प्यार उमंग रंग में भीगो सुन्दर फाग मचाओ ।मिलजुल जी की गांठे खोलो हित की गांठ बँधाओ ।प्रीति को बेलि उ...
देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले । आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते है...
ज्यों निकल कर बादलों की गोद सेथी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?
देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,चू पडूँगी या कमल के फूल में ?
बह गयी उस काल एक ऐसी हवावह समुन्दर ओर आई अनमनी।एक स...
मान अपना बचावो, सम्हलकर पाँव उठावो । गाबो भाव भरे गीतों को, बाजे उमग बजावो ॥ तानें ले ले रस बरसावो, पर ताने ना सहावो ।भूल अपने को न जावो ।।१।।
बात हँसी की मरजादा से कड़कर हँसो हँसावो । पर अपने को बात बुरी कह आँखों से न गिरावो ।हँसी अपनी न करायो ॥२॥
खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो । पर अति...
जला सब तेल दीया बुझ गया है अब जलेगा क्या ।बना जब पेड़ उकठा काठ तब फूले फलेगा क्या ॥1॥
रहा जिसमें न दम जिसके लहू पर पड़ गया पाला ।उसे पिटना पछड़ना ठोकरें खाना खलेगा क्या ॥2॥
भले ही बेटियाँ बहनें लुटें बरबाद हों बिगड़ें ।कलेजा जब कि पत्थर बन गया है तब गलेगा क्या ॥3॥
चलेंगे चाल मनमानी बनी बातें ब...
अपने अपने काम से है सब ही को काम। मन में रमता क्यों नहीं मेरा रमता राम ॥
गुरु-पग तो पूजे नहीं जी में जंग उमंग। विद्या क्यों विद्या बने किए अविद्या संग॥
बातें करें आकास की बहक बहक हों मौन। जो वे बनते संत है तो असंत हैं कौन ॥
अपने पद पर हो खड़े तजें पराई पौर।रख बल अपनी बाँह का बनें सफल सिरमौर॥
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हैं जनम लेते जगह में एक ही,एक ही पौधा उन्हें है पालता।रात में उन पर चमकता चांद भी,एक ही सी चांदनी है डालता।।मेह उन पर है बरसता एक-सा,एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं।पर सदा ही यह दिखाता है हमें,ढंग उनके एक-से होते नहीं।।छेद कर कांटा किसी की उंगलियां,फाड़ देता है किसी का वर वसन।प्यार-डूबी तितलियों का पर...