बस में छूट जाने के कारण, पुलिस ने उसका सामान, अपने कब्ज़े में ले लिया था। अब, किसी परिचित आदमी की ज़मानत के बाद ही, वह सामान उसे मिल सकता था।
“मेरी पत्नी सख़्त बीमार है। मेरा जल्दी घर पहुंचना बहुत ज़रूरी है होल्दार सा’ब !” उसने विनती की।
“भई, कह तो दिया, किसी जानकार आदमी...
उसकी निगाह अलमारी पर गई, तो देखा, रवि ने उसकी सारी किताबों तथा कई दूसरी ज़रूरी चीजों को, बेतरह एक ओर खिसका कर, वहां अपना बस्ता जँचा दिया है। उसे बच्चे की इस हरकत पर ग़ुस्सा तो नहीं आया, पर पूछ लिया, "रवि महाशय, तुमने मेरी चीज़ें उधर क्यों खिसका दी हैं?"
"मेरा बस्ता ठीक से नहीं आ रहा था ना, इसलिए...
सीमा पार से निरन्तरघुसपैठ जारी है।'वसुधैव कुटुम्बकम' नीति यही तो हमारी है।
2)दलदल में धंसा है। आरक्षण और तुष्टिकरण के,दो पाटों के बीच में भारत अब फंसा है।
3)लूट-खसोट प्रतियोगिता कब से यहां जारी है। कल तक उन्होंने लूटा था,अब इनकी बारी है।
4)देश के संसाधनों को राजनीति के सांड चर रहे हैं, और उसका...
फिल्म चल रही थी। जो व्यक्ति अभिनय कर रहा था, न भाव उसके थे, न स्वर और संगीत, यहाँ तक कि फिल्म की पटकथा और संवाद भी किसी और के लिखे हुए थे तथा उसे निर्देशित भी कोई और ही कर रहा था।
मुझे लगा, वह अभिनेता कोई और नहीं, मैं स्वयं हूँ और मैं कोई फिल्म नहीं देख रहा, बल्कि अपनी ही कहानी सुन रहा हूँ...
देखे जो छविजड़ में चेतन कीवही तो कवि
किस्त चुकातेचुक गया जीवनचुके न खाते
दु:ख पाहुनाकुछ लेकर आयादेकर गया
घर में घरआदमी में आदमीफिर भी डर
-डॉ रामनिवास मानव
छुट्टियाँ बिताकर, चलते समय उसने, बैठक की ड्योढ़ी पर गुमसुम बैठे काका के चरण छुए, तो काका ने, आशीर्वाद के लिए अपना हाथ, उसके सिर पर रख दिया-“आच्छ्यो बेट्टा ! हुंस्यारी सीं जइए। मैं तो इब तुन्नै जाता नै बी ना देख सकूँ, आँख फूटगी।”
वह द्रवित हो उठा। समूचा अतीत, किसी चलचित्रा की भाँति, ए...
तड़ातड़ तीन लाठियाँ पड़ीं, सांप तड़फकर वहीं ढेर हो गया।
एक बोला—“मैंने ऐसे जमा कर लाठी मारी थी कि टिकते ही सांप के प्राण निकल गए।”
“तुम्हारी लाठी ठीक जगह नहीं लगी थी। सांप मरा तो मेरी लाठी से था।” दूसरा बोला।
“तुम दोनों झूठ बोल रहे हो।” तीसरे ने कहा&md...
चौराहे पर चर्चा चल रही थी। पूर्णिमा-हत्याकांड के सभी आरोपी बरी हो गये लेकिन प्रश्न था कि जब पूर्व-आरोपियों ने उसे नहीं मारा, तो फिर मारा किसने?
इस गंभीर प्रश्न का सरल-सा उत्तर था एक सामान्य से आदमी के पास ‘कानून ने।’
-डॉ रामनिवास मानव
गली-मुहल्ले चुप सभी, घर-दरवाजे बन्द।कोरोना का भूत ही, घुम रहा स्वच्छन्द॥
लावारिस लाशें कहीं और कहीं ताबूत। भीषण महाविनाश के, बिखरे पड़े सबूत॥
नेता, नायक, आमजन, सेना या सरकार। एक विषाणु के समक्ष, सब कितने लाचार॥
महानगर या शहर हो, कस्बा हो या गांव। कोरोना के कोप से, ठिठके सबके पांव॥
मरघट-सा खाम...
डॉ. 'मानव' दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ दोहे यहां दिए जा रहे हैं:
1ये पत्थर की मूर्तियां, ये पाहन के देव।इनकी पूजा-अर्चना, मुझको लगे कुटेव।।
2गगन-विहारी देवता, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।मिलकर कुछ ऐसा करें, विश्व का...
डॉ० 'मानव' लघु-कथा के अतिरिक्त दोहा, बालकाव्य, हाइकु इत्यादि विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं। उनकी कुछ लघु-कथाएं यहाँ संकलित की जा रही हैं। पढ़िए डा 'मानव' की लघु-कथाएं।
डॉ. 'मानव' हाइकु, दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ हाइकु यहाँ दिए जा रहे हैं:
१)
मोटी कमाई;देश तो है बकरा,नेता कसाई ।
पहन नया कुर्ता-पजामा,निकले घर से बन्दर मामा।चले जा रहे रौब दिखाते,पैर पटकते, गाल फुलाते।
कहा किसी ने नेताजी हैं,अजी नहीं, अभिनेता ही हैं।नाम सदाचारी है इनकाकाम अदाकारी है इनका।
रंग बदलने में ये माहिर,रूप बदले में जग-जाहिर।गांधी-भक्त कहाते हैं ये,देश लूटकर खाते हैं ये।
सुनसुनकर ये तीखी बातें,सो...
पत्रकारिता थी कभी, सचमुच मिशन पुनीत।त्याग तपस्या से भरा, इसका सकल अतीत।।
बालमुकुन्द, विद्यार्थी, लगते सभी अनन्य। पाकर जिनको हो गई, पत्रकारिता धन्य।।
कलम बनाकर हाथ को, लिखे रक्त से लेख। बदली भारतवर्ष की, तभी भाग्य की रेख।।
कांटों-भरे थे रास्ते, मंजिल भी थी दूर। पत्रकार थे सब मगर, हिम्मत से भरपू...
भारी-भरकम बस्ता लेकर,मोनू चला स्कूल।लेकिन कॉपी और पैन्सिलघर पर आया भूल।
मैडम ने प्यार किया उसको,फिर समझाया यूं-'बिन हथियार युद्ध में जानाहोता है फिजूल।'
बात समझ में आई उसके,गलती की कबूल।दिया आश्वासन, होगी कभीफिर न ऐसी भूल।
--डॉ रामनिवास मानव
चक्की के पाट का चनों के प्रति व्यवहार बड़ा निर्मम था। अतः एक दिन कुछ चनों ने मिलकर उसे फोड़ दिया। चने चाहते थे कि पाट ऐसा हो, जो उनके दर्द को समझे और उनकी भावनाओं की कद्र करे।
पाट बदल दिया गया। नया पाट पहले पाट से कहीं भारी था। चक्की फिर चलने लगी। चने अब भी पिस रहे थे।
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पापाजी का पैन चुरा कर मूँछ बनाई मोनू ने। दादा जी का बेंत उठाकरपूंछ लगाई मोनू ने।
करने लगे उत्पात अनेक उछल-उछल कर फिर घर में किया नाक में दम सभी का मोनू जी ने पल-भर में।
मम्मी के समझाने से भी न मोनू महाशय माने। डंडाजी जब दिए दिखाई, तब आये होश ठिकाने।
-डॉ रामनिवास मानव [ धूम मचाते मोनू जी, अनुपम...
डॉ. 'मानव' हाइकु, दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। गांव पर लिखे उनके कुछ हाइकु यहाँ दिए जा रहे हैं:
दूध न पानी,आज हर गांव की यही कहानी
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आज किसान सबका अन्नदाता है परेशान।
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पीपल-नीम :हैं गंवई--गांव के सस्ते हकीम...